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Showing posts from May, 2012

गीता एक परम रसायन है

लोग भाग रहे हैं , मनुष्य जबसे दो पैरों पर खडा हुआ है तब से भाग रहा है , संसार में जीवन का अंत आ जाता है , इस भाग का कोई अंत नहीं , देखनें में कुछ ऐसा दिखता है लेकिन एक आयाम ऐसा है जहाँ पहुंचनें पर भागनें का आकर्षण समाप्त सा हो जाता है लेकिन लोग उस से बच कर आगे निकल जाते हैं और इस आयाम का नाम है श्रीमद्भगवद्गीता / आप क्या चाहते हैं , योग , ध्यान , भक्ति , न्याय , सांख्य , मिमांस , वैशेषिका या फिर वेदांत ? गीता में क्या नहीं है , आप लेनें वाले तो बनो / वैज्ञानिक कहते हैं , गीता भारत भूमि पर लगभग पांच हजार सालों से किसी न किसी रूप में उपलब्ध है लेकिन लोग इसे तब याद करते हैं जब सामनें मृत्यु एक काली छाया के रूप में धुधली - धुधली दिखनें लगती है / ऎसी मान्यता है कि जब प्राण निकल रहे हों तब गीता के दो - एक शब्द भी यदि कानों के माध्यम से ह्रदय में उतर जाएँ तो वह ब्यक्ति सीधे परम गति को प्राप्त करता है लेकिन कान के माध्यम से ह्रदय में उतरनें की प्रक्रिया इतनी आसान नहीं जितना आसान हम हिंदू लोग समझते हैं / गीता सु

गीता एक परम राह है

गीता में साकार प्रभु श्री कृष्ण का तन है , मन है , बुद्धि है और चेतना है और इनके माध्यम से वह जो गीता से अपनें को जोड़ रखा है , निराकार प्रभु श्री कृष्ण के आयाम में पहुंचनें वाला ही होता है / क्या है निराकार प्रभु श्री कृष्ण ? जैसे सभीं नदियों का आखिरी ठिकाना सागर होता है वैसे सभीं मनुष्य का आखिरी ठिकाना निराकार प्रभु अर्थात श्री कृष्ण होते हैं / भगवान राम को आंशिक अवतार माना गया है और प्रभु श्री कृष्ण को पूर्ण अवतार के रूप में मनीषी लोग अभीं तक देखते रहे हैं / ऎसी कौन सी बात है कि लोग प्रभु श्री कृष्ण को पूर्ण अवतार के रूप में देखते हैं ? प्रभु श्री कृष्ण कभीं हमारे सामनें एक सांख्य – योगी के रूप में आते हैं , कभीं भक्तो के सागर प्रेम - सागर के रूप में दिखते हैं , कभीं चक्र धारण किये हुए महाकाल के रूप में दिखते हैं , कभीं ममता के साकार रूप में बाल कन्हैया के रूप में दिखते हैं और कभी नटखट माखन चोर के रूप में हम सब के ह्रदय में स्थित निराकार कृष्ण को साकार रूप में दिखाते हैं , आखिर कहाँ जाओगे भाग कर जहाँ जिस मन दशा में तुम जाओगे प्रभु श्र

गीता एक परम बसेरा है

गीता पढते हो उत्तम है गीता पर सोचते हो , वह भी उत्तम है लेकिन … ... यदि तुम्हारी सोच गुण तत्त्वों पर आधारित है तो तुम … ..... गीता के माध्यम से स्वयं को धोखा दे रहे हो // गीता महाभारत का अंग है , गीता सांख्य - योग का सार है और गीता वेदान्त है , ऎसी अनेक बातें आप गीता सम्बंधित साहित्य में देखते हैं लेकिन इन बातों से से न तो बुद्धि तृप्त होती हैं और न ही कोई स्वप्रकाशित मार्ग ही दिखता है जिस पर हम चल कर अपनें अज्ञेय लक्ष्य पर पहुँच सकें / क्या है यह हमारा अज्ञेय लक्ष्य ? और क्या है यह स्वप्रकाशित मार्ग / अज्ञेय लक्ष्य है प्रभु मय जीते हुए प्रभु में प्रवेश पाना , वह भी द्रष्टा की स्थिति में और स्वप्रकाशित मार्ग वह मार्ग है जिसकी यात्रा के दौडान मन – बुद्धि में मात्र एक तत्त्व बना रहता है और दूसरे तत्त्व के प्रवेश की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती / स्वप्रकाशित मार्ग है उस यात्रा - पथ का नाम जिस पर चलनें वाला न हाँ समझता है न नां , न अच्छा को समझता है न बुरे को , न अपना - पराया को समझाता है तथा न सुख को समझता है और न दुःख को , वह तो मात्र एक द्रष्टा

जीवन समीकरण

आत्मा , ह्रदय एवं प्रभु श्री कृष्ण के सम्बन्ध को हम एक साथ गीता दृष्टि से देख रहे है और इस सम्बन्ध में गीता के दो और श्लोकों को हम देखनें जा रहे हैं जो इस प्रकार हैं ------ गीता श्लोक – 15.7 मम एव अंशः जीवलोके जीव भूतः सनातनः / मनः षष्ठानि इन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानी कर्षति // भावार्थ इस देह में सनातन जीवात्मा मेरा ही अंश है और वही प्रकृति में स्थित मन सहित पांच ज्ञानेन्द्रियों को आकर्षण करता है / गीता श्लोक – 15.11 यतंतः योगिनः च एनं पश्यन्ति आत्मनि अवस्थितम् / यतंतः अपि अकृत आत्मानः न एनं पश्यन्ति अचेतसः // भावार्थ यत्नशील योगीजन अपने ह्रदय में स्थित आत्मा को तत्त्व से जानते हैं लेकिन अचेत ब्यक्ति ; अज्ञानी इस आत्मा को यत्न करनें पर भी नही समझ पाता / जो लोग गीता श्लोक – 15.7 को पढेंगे उनके लिए आत्मा प्रभु का अंश है और जिसका स्थान जीवों का ह्रदय है और जो लोग गीता श्लोक – 10.20 को पढेंगे उनके लिए आत्मा रूप में प्रभु श्री कृष्ण सभीं जीवों के ह्रदय में स्थित हैं / आत्मा , परमात्मा एवं ह्रदय का गहरा सम्बन्ध है और आत्मा उस ऊर्जा का श

प्रभु श्री कृष्ण आत्मा को क्या समझते हैं

पिछले अंक में ईश्वर एवं श्री कृष्ण के सम्बन्ध में गीता के श्लोक 18.61 , 18,62 एवं 18.66 को हमनें देखा जहाँ प्रभु श्री कृष्ण कह रहे हैं … .... [ क ] अर्जुन ! तूं उस परमेश्वर की शरण में जा जो सबके ह्रदय में स्थित है और सबको उनके कर्मों के अनुसार अपनी माया के प्रभाव से घुमा रहा है [ श्लोक – 18.61 , 18.62 ] [ ख ] हे अर्जुन ! तूं पूर्णरूप से सभीं धर्मों को त्याग कर मेरी शरण में आजा [ मामेकं शरणं ब्रज ] , मैं तुमको सभीं पापों से मुक्त कर दूंगा [ अहम् त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ] अब देखते हैं आगे … ... गीता श्लोक – 10.20 अहमात्मा गुणाकेश सर्वभूताशयस्थित : हे अर्जुन ! मैं सभीं जीवों के ह्रदय में आत्मा के नाम से स्थित हूँ / गीता श्लोक – 13.22 उपद्रष्टा अनुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः परमात्मा इति च अपि उक्तः देहे अस्मिन् पुरुषः परः इस देह में स्थित यह आत्मा वास्तव में परमात्मा ही है वही शाक्षी होनें से उपद्रष्ट और यथार्थ सम्मति देनेंवाला होनें से अनुमन्ता , सबका धारण – पोषण करनें वाला होनें से भर्ता , जीव रूपेण भोक्ता , ब्रह्मा आदि

श्री कृष्ण एवं ईश्वर

गीता श्लोक – 18.61 ईश्वरः सर्भूतानाम् हृद्देशे अर्जुन तिष्ठति भ्रामयन् सर्वभूतानि यंत्रारुढानि मायया हे अर्जुन ! शरीर एक यांर की भांति है और इस यन्त्र में आरूढ़ हुए ईश्वरसब के ह्रदय में बैठा , अपनी माया से सभीं के कर्मों के अनुकूल भ्रमण करा रहा है ----- अगला श्लोक … .. गीता श्लोक – 18.62 तम् एव शरणम् गच्छ सर्वभावेन भारत तत् प्रसादात् पराम् शांतिम् स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतं हे भारत ! तुम उनकी शरण में जा तुमको उनके प्रसाद स्वरुप परम शाश्वत शांति मिलेगी और तुम परम धाम को प्राप्त होगा / अब देखिये गीता श्लोक – 18.66 सर्वधर्मान् परित्यज्य मां एकं शरणम् व्रज अहम् त्वा सर्व पापेभ्य : मोक्षयामि मा शुचः यहाँ प्रभु कह रहे हैं … ..... सभीं धर्मों को त्याग कर तुम मात्र मेरी शरण में आजा , मैं तुमको सभी पापों से मुक्त कर दूंगा तुम चिता न कर // प्रभु श्री कृष्ण पहले दो सूत्रों में कह रहे हैं अर्जुन को कि तुम उस ईश्वर की शरण में जा जो सबके ह्रदय में स्थित है और तुम उसके प्रसाद रूप में परम धाम की प्राप्ती करेगा और यहाँ आकिरी श्लोक में कह रहे हैं , हे अर्जुन तुम मात्र

गीता और पूजन

गीता श्लोक – 9.25 यान्ति देवब्रता : देवान् पितृन् यान्ति पितृव्रता : / भूतानि यान्ति भूतेज्या : यान्ति मद्याजिन : अपि माम् // इस श्लोक को कुछ इस प्रकार से पढ़ें … ..... देवब्रता : देवान् यान्ति पितृव्रता : पितृन् यान्ति / भूतेज्या : भूतानि यान्ति मद्याजिन : माम् अपि यान्ति // भावार्थ … .. देव – पूजक देवताओं को प्राप्त करते हैं , पितरों की पूजा जो करते हैं वे पितरों को प्राप्त करते हैं , भूतों की पूजा करनें वाले भूतों को प्राप्त करते हैं और मेरी पूजा जो करते हैं वे मुझे प्राप्त करते हैं / अब देखिये गीत श्लोक – 8.16 की दूसरी पंक्ति को जो इस प्रकार है … .. माम् उपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न् विद्यते // वह जो मुझे प्राप्त करता है उसका पुनर्जन्म नहीं होता इस श्लोक को समझनें के लिए दो बातों को समझना चाहिए ------ [ क ] पूजा क्य है ? [ ख ] पुनर्जन्म का न होना क्या है ? पूजा क्य है ? साकार से निराकार में जो पहुंचा कर परमानंद की अनुभूति में डुबो कर रखे , वह है पूजा / Pooja is an endless journey which starts from manifest and takes into unmani

मित्रता और संदेह

मित्रता और संदेह मित्रता और संदेह एक साथ एक समय एक मन – बुद्धि में नहीं राह सकते / जहाँ मित्रता है वहाँ संदेह नहीं और जहाँ संध है वहाँ मित्रता की एक किरण भी नहीं हो सकती / गीता का आधार है अर्जुन का मोह ; अर्जुन जिनके खून के प्यासे थे और पूरी तैयारी के साथ कुरुक्षेत्र में पधारे थे , जब उनको वहाँ देखते हैं तब उनके अंदर बह रही ऊर्जा की दिशा बदल जाती है और कामना मोह में बदल जाती है / अर्जुन के परम मित्र हैं प्रभु सांख्य – योगीराज श्री कृष्ण जो उनके रथ के सारथी भी हैं / प्रभु जब अर्जुन को युद्ध प्रारम्भ होनें के चंद क्षणों के पहले मोह में डूबते हुए देखते हैं तब उनको वे सभीं युक्तियाँ दिखती हैं जिनका सीधा सम्बन्ध है मोह – मुक्ति से / गीता का अर्जुन गीता के अंत तक प्रभु का मित्र नहीं कहा जा सकता क्योंकि गीता में आखिरी अध्याय [ अध्याय – 18 ] के प्रारम्भ में भी प्रश्न कर रहा होता है / गीता का अर्जुन प्रभु का मित्र तो नहीं है लेकिन प्रभु उसे मोह से निकाल कर यह उसे जरुर स्पष्ट कर देते हैं की , देख तूं मेरा मित्र था और अब भी है जब तूं मोह – मुक्त है /