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गीता में दो पल भाग - 3

* भोग - कर्म योग - कर्ममें पहुँचा सकता है । * योग - कर्म , योग सिद्धि में पहुँचाते हैं । << और अब आगे >> * मनुष्यका कर्म जीवन की जरुरत को पूरा करनेंका हेतु तो है लेकिन यह भोग से योग में पहुँचानें का भी एक सरल माध्यम है । भोग में भोग तत्त्वों के प्रति होश बनाना ही कर्म योग है ।कर्म में कर्म तत्त्वों की गांठों को खोलना ,योग या ध्यान है । योग जब उपजता है यब कर्म तत्त्वों की पकड़ समाप्त हो जाती है। कर्म - तत्त्वों की पकड़ जब नहीं होती तब भोग के प्रति वैराग्य हो जाता है । वैराग्य में ज्ञान की प्राप्ति होती है और ज्ञान परम सत्य का आइना होता है । * इतनी सी बात यदि गहराई से पकड़ी जा सके तो परम सत्यकी किरण दिखनें लगती है । <> अब ज़रा इन बातों को पकड़ें <> * भोग से भोग में हम हैं --- * भोगमें भोग तत्त्वों की गाठों को हमें खोलना है --- * निर्ग्रन्थ की स्थिति को योग सिद्धि कहते हैं --- * योग सिद्धि प्रभुका खुला द्वार है ।। ~~ ॐ ~~