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गीता तत्त्व भाग - 2

● गीता तत्त्व - 2●  ° गीता श्लोक -2.2°   " कुतः त्वा कुश्मलम् इदं बिषमे समुपस्थितम् " ।  ** प्रभु श्री कृष्ण अर्जुन से पूछ रहे है , "असमय में तुमको यह मोह कैसे हो गया ?"  ** अब हम देखते हैं कि प्रभु कैसे समझ रहे हैं कि अर्जुन मोहके सम्मोहनमें है ?   ● गीता अध्याय - 1 में अर्जुन के 23 श्लोक हैं , प्रभु इस अध्याय में कुछ नहीं बोलते ,धृत राष्ट्र का एक श्लोक है और संजय के भी 23 श्लोक हैं । अर्जुन ऐसी कौन सी बात बोलते हैं जो प्रभुको संकेत देती हैं कि वह मोह सम्मोहन में उलझा हुआ है ?  * अर्जुन युद्ध -क्षेत्र में दोनों सेनाओं को आमनें-सामनें देख कर अपनें सारथी श्री कृष्ण को कह रहे हैं , हे कृष्ण ! आप मेरे रथ को दोनों सेनाओं के मध्य ले चलें ,मैं दोनों तरफ ले लोगों को एक बार देखना चाहता हूँ ।  * प्रभु रथ को दोनों सेनाओं के मध्य खड़ा करते हैं और अर्जुन अपनें ही कुल और सगे संबंधियों को देखते हैं और बोलते हैं :-- * मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं । * मेरा मुख सूख रहा है । * मुझे रोमांच हो रहा है । * मेरे शरीरमें कम्पन हो रहा है । * मेरी त्वचामें जलन हो रही है । * मेरा मन भ्रमित हो

गीता तत्त्व भाग - 01

● गीता तत्त्व -दो शब्द ●   * गीता मूलतः अर्जुन और प्रभु श्री कृष्णके संबादके रूप में  ज्ञान -विज्ञानका एक ऐसा रहस्य है जिसमें भोग कर्मको रूपांतरित करके उसे कर्म योगका रूप देनेंकी पूरी मनोवैज्ञानिक गणित दी गयी है ।  * गीतामें अर्जुन अपनें 16 प्रश्न 86 श्लोकोंके माध्यम से एक के बाद एक उठाते हैं और प्रभु उनके प्रश्नों के सम्बन्ध में अपनें 574 श्लोकों को बोलते हैं ।   * गीताका प्रारम्भ धृतराष्ट्रके श्लोक से है जिसमें वे अपनें सहयोगी संजयसे पूछ रहे हैं :---  " धर्म क्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेताः युयुत्सवः ।  मामकाः पाण्डवा: च एव किम् अकुर्वत संजय ।।"  < भाषांतर >  " हे संजय ! धर्म क्षेत्र कुरुक्षेत्रमें मेरे और पाण्डु के पुत्रोंनें क्या किया ? "  * गीता के 700 श्लोको में धृतराष्ट्रका यह एक मात्र श्लोक है और इनके सहयोगी संजयके अपनें श्लोक 39 हैं ।  * गीता - ज्ञान , गीता के 660 श्लोकों ( अर्जुन के 86 श्लोक + प्रभु के 574 श्लोक ) में ही सीमित होना चाहिए लेकिन यदि 01 श्लोक धृतराष्ट्रका और 39 श्लोक संजयके गीता से निकाल दिए जाएँ तो गीता अधूरा हो जाता है।  * गीता तत्त्व

संसार रहस्य - 1

●संसार रहस्य - 1● ●● गास्पेलमें संत जोसेफ कहते हैं : सृष्टिका प्रारम्भ शब्द रूप प्रभु है और भागवतमें ब्रह्मा , मैत्रेय , कपिल और कृष्ण भी यही बात कहते हैं और इसकी पूरी गणित देते हैं ●● ^^ आइये ! चलते हैं इस संसार रहस्य में । <> संसारको समझनें केलिए हमारे पास पांच माध्यम ( tools ) हैं ; पांच ज्ञान इन्द्रियाँ जैसे आँख ,नाक ,कान , जिह्वा और त्वचा । आँखसे रूप - रंगको ,नाकसे गंधको , कानसे शब्दको , जिह्वासे रसको और त्वचासे संवेदनाको हम समझते हैं । <> पांच महाभूत और प्रत्येक महाभूतका अपना - अपना बिषय ( तन्मात्र ) होता है । पृथ्वी ,जल ,वायु , अग्नि और आकाश - ये पांच महाभूत हैं जिनमें पृथ्वीका गंध , जलका स्वाद , वायुका रूप , अग्निका तेज , आकाश का शब्द बिषय (तन्मात्र ) हैं । <> भागवतमें ऋषभ जी के नौ योगीश्वर पुत्र सम्राट निमि ( विदेह जनक ) तत्त्व ज्ञानके माध्यमसे प्रलयके समय मायाके कार्यको कुछ इस प्रकारसे ब्यक्त करते हैं । *वायु प्रलय कालमें पृथ्वीके गंधको चूस लेती है और गंधहीन पृथ्वी जलमें बदल जाती है अर्थात वायु पृथ्वीको जल में बदलती है । * जब प्रलय कालमें पृथ्वी जलमें

मूर्ति एक माध्यम

● मुर्तिके माध्यमसे ...  <> पिछले अंकमें आठ प्रकारकी मूर्तियोंको देखा गया जिनको भागवत दो भागों में देखता है ; एक चल मूर्ति होती है और दूसरी अचल ।  <> मुर्तिके माध्यमसे साधन करना अति सरल है और अति कठिन भी । साधना तन - मन का वह मार्ग है जो ब्रह्मके साथ एकत्व स्थापित करता है । ब्रह्मसे एकत्व स्थापित होना समाधि  है ,समाधि इन्द्रियों और मन -बुद्धिमें बह रही उर्जाके रुखको बदलती है। समाधि साधनाका फल है जहाँ साधक साकारका द्रष्टा - साक्षी होता है और इन्द्रियों ,मन -बुद्धिमें बह रही उर्जा निर्विकार होती है । समाधि वह द्वार है जिसके दरवाजे तक साकार की पहुँच होती है और जिसके अन्दर निराकार की अनुभूति । समाधिकी लोगोंनें परिभाषा बुद्धि स्तर पर बनाया है लेकिन उससे समाधि स्पष्ट नहीं होती । क्या विकल्प और क्या निर्विकल्प समाधि ,समाधि तो वह घडी है जब परम का द्वार खुलता है , साधक द्वार खुलना देखता है लेकिन क्षण भरमें वह समाधि में ऐसे खीच जाता है जैसे कोई ब्लैक होल किसी कोस्मिक बॉडी को खीच लेता है ।  * समाधिकी अनुभूति अब्यक्तातीत है उसे कोई आज तक ब्यक्त नहीं कर सके और जो कोशिश भी किये वे पूर्ण

मूर्तियोंके प्रकार

सन्दर्भ : भागवत : 11.27+12.20  <> मूर्तियाँ पूजा करनें की दृष्टि से 08 प्रकार की कही  गयी हैं :----- * पत्थर की * लकड़ी की * धातु की * मिटटी या चन्दन की * चित्रमयी * बालू या रेत की * मणि की * मन मयी ।  # इन मूर्तियों को दो भागों में विभक्त करते हैं ।  1- चल मूर्ति 2- अचल मूर्ति  1- चल मूर्ति :  ऐसी मूर्तियोंका प्रतिदिन आवाहन - विसर्जन करनें और न करनेंका विकल्प है ।  2- अचल मूर्ति : अचल मूर्तियोंका प्रति दिन आवाहन - विसर्जन नहीं करना  चाहिए ।  # बालू या रेतकी मूर्तिका प्रति दिन आवाहन - विसर्जन करना अनिवार्य है ।  # मिटटी , चन्दन , चित्र मयी मूर्तियोंको स्नान करना वर्जित है केवल मार्जन करना चाहिए ।  ~~~ ॐ ~~~

ब्रह्म और माया

● गीता ज्ञान-1● * पूरा ब्रह्माण्ड जो सीमारहित है जब रिक्त गो जाता है अर्थात जब इसमें जोई दृश्य नहीं रहता तब यह ब्रह्म होता है । * ब्रह्मसे ब्रह्ममें तीन गुणोंका एक माध्यम विकसित होता है जिसे ब्रह्मकी माया कहते हैं ।ब्रह्म और मायाको अलग नहीं किया जा सकता और यह भी नहीं कहा जा सकता कि ब्रह्म ही माया है या माया ही ब्रह्म है ।ब्रह्मसे माया है , मायाका अस्तित्व ब्रह्म आधारित है लेकिन ब्रह्मका अस्तित्व माया आधारित नहीं है । * माया और काल रूप ब्रह्मसे महत्तत्त्वका निर्माण होता है जो मायासे मायामें एक ऐसा माध्यम है जिसमें जीव निर्माण करनेंकी क्षमता है । * आज वैज्ञानिक इस महत्तत्त्वको कण रूपमें प्रयोगशालामें पैदा करनेंकी चेष्ठामें लगे हुए हैं । ~~~ ॐ ~~~

कर्म से कृष्णमय कैसे हों ?

● कर्म से कृष्णमय कैसे हों ? 1- जो तुम्हारा कर्म है उसमें कर्म बंधनोंको समझो । 2- कर्म - बंधन वे तत्त्व हैं जो कर्म करनेंकी प्रेणना देते हैं । 3- कर्मका सम्बन्ध जबतक भोगसे हैं तबतक कर्म - बंधन होंगे (आसक्ति ,कामना ,क्रोध ,लोभ ,मोह , भय ,आलस्य और अहंकार ) । 4- जब कर्म कर रहे ब्यक्ति का कर्म ऊपर वताये गए भोग - तत्त्वों से प्रभावित नहीं होता तब वह कर्म , योग बन जाता है । 5 - कर्म - योगमें रहनें का अभ्यास योग सिद्धि में पहुंचाता है । 6 - योग सिद्धि से ज्ञानकी प्राप्ति होती है । 7- ज्ञान से वैराज्ञ मिलता है जहां भोग कर्म अकर्म सा दिखता है और भोग-अकर्म ,कर्म सा दिखता है । 8 - ज्ञानसे कर्म संन्यासमें कदम पड़ते हैं । 9 - कर्म संन्यासी ही योगी होता है । 10 - योगी की पीठ भोग की ओर और ऑंखें परमात्मा पर टिकी होती हैं । 11 - या निशा सर्व भूतानां , तस्यां जागर्ति संयमी । यस्यां जाग्रति भूतानि , सा निशा पश्यतः मुने : ।। ** यहाँ आप देखें :--- गीता : 2.69 + 4.18 + 4.37 + 4.38 4.41 + 6.1-6.5 तक ~~~ ॐ ~~~

प्रलय की तस्बीर

● प्रलयके प्रकार ● °° सन्दर्भ : भागवत : 3.11+ 11.4 + 12.4 °° ** प्रलय चार प्रकारकी हैं :--- 1- नैमित्तिक प्रलय : यह प्रलय 4.2 billion वर्षों के बाद होती है ।यह अवधि 1000 x ( चार युगोंकी अवधी ) के बराबर होती है ।इस प्रलयके बाद इतनें और समय तक कोई सृष्टि नहीं होती सर्वत्र अँधेरा और जल होता है ।गीता अध्याय - 8 सूत्र 16-20 तक में ऐसी स्थितिको ब्यक्त किया गया है ।एक कल्पमें 14 मनु होते हैं और एक मनुका समय होता है 71.6/14x चार युगों की अवधि । 2- प्राकृतिक प्रलय : इस प्रलयको भागवत : 11.3 में देखा जा सकता । इस प्रलयमें प्रकृति की कोई सूचना तो होती ही नहीं यहाँ तक कि सूक्ष्म मूल तत्त्व जैसे महत्तत्त्व ,अहंकार , 05 तन्मात्र (बिषय ) भी अपनें मूल प्रकृतिमें समा जाते हैं । * वायु पृथ्वीके गंधको लेलेती है और पृथ्वी जलमें बदल जाती है । *जलका रस वायु चूस लेती है और जल अग्नि में बदल जाता है । * अन्धकार अग्निका रूप लेलेता है और अग्नि वायीमें बदल जाती है । * आकाश वायुसे स्पर्श लेलेता है और वायु आकाश में समा जाती है । * आकाशसे शब्द काल लेलेता है और आकाश तामस अहंकारमें बदल जाता है । * इस प्रक

गीता और विज्ञान

● अपनीं स्थितिको समझो ●  " Human being is a part of the universe limited in time - space ."  Prof. Albert Einstein 1879 - 1955  प्रो. आइन्स्टीन अपना सारा जीवन लगा दिया प्रकृतिके उस नियमको समझनें में जो नियम इस ब्रह्माण्डको चला रहा है , आइन्स्टीनका वह नियम ही भगवान है । आइन्स्टीनके जीवनके 55साल (190 1-1955 तक) उस नियमकी खोजमें गुजरे लेकिन वह नियम न मिल सका। बुद्ध और महावीर 50 साल तक उस नियमको व्यक्त करनेंमें लगाये लेकिन ब्यक्त न कर पाए , तो आइये देखते हैं गीता और श्रीमद्भागवत पुराणके आधार पर उस परम सनातन नियम को ।  सन्दर्भ : भागवत सूत्र : 1.13+ 3 10+3.25+6.1 और गीता अध्याय - 13+15  ** काल ( time )के प्रभावमें प्राणसे भी वियोग होजाता है ।काल वह चक्र है जो प्रकृति की सूचनाओं को बनाता है , उनको अपनी ओर खीचता रहता है और अंततः उनको अपनें में समा लेता है । कालको समझनें केलिए विषयोंमें निरंतर हो रहे परिवर्तनको देखा जा सकता है ।  ** प्रभुसे प्रभुमें तीन गुणोंका एक माध्यम है जिसे माया  कहते हैं : इस बात को समझते हैं ।विज्ञान में टाइम -स्पेस (time -space ) है जो संसारके उत्पत्तिका मा

राग - द्वेष

°° गीता - 3.34 °° इन्द्रियस्य इन्द्रियस्य अर्थे रागद्वेषौ ब्यवस्थितौ । तयो : न वशं आगच्छेत् तौ हि अस्य परिपन्थनौ ।। " इन्द्रिय - बिषय राग - द्वेषकी उर्जासे परिपूर्ण हैं , इनका सम्मोहन मनुष्यको प्रभुसे दूर रखता है । " " All five objects of senses have potential energies of attraction and aversion . These two elements are strong barrier in the way of truth - seekers . " ** कर्मयोग - साधनामें बिषय और इन्द्रिय साधना मूल साधन है जो मनमें सात्त्विक उर्जा का संचार करती है । मनुष्यका मन मूल रूप से सात्त्विक अहंकारके ऊपर कालके प्रभावसे उत्पन्न है लेकिन देहमें यह तीन गुणोंकी उर्जासे भरा हुआ होता है । मन आसक्त इन्द्रिय का गुलाम है और बुद्धि मनके अधीन रहती है ।मन - बुद्धि तंत्रसे गुण साधना द्वारा काम से राम की यात्रा होती है । जिस घडी मन - बुद्धिमें केवल सात्त्विक गुणकी ऊर्जा प्रवाहित हो रही होती है उस घडी वह मनुष्य प्रभुमय होता है । ~~~ ॐ ~~~

मोह वैराज्ञ

● मोह - वैराज्ञ ● °° गीता - 2.52 °° यदा ते मोहकलिलं बुद्धिः ब्यतितरिष्यति। तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतब्यस्य श्रुतस्य च ।। " जब तेरी बुद्धि मोह - दलदलसे बाहर होगी तब तुम सुनें हुए और सुननेंमें आनें वाले सभीं भोगोंसे तुम्हे वैराज्ञ हो जाएगा " भावार्थ :-- " मोह भोगकी रस्सी है और मोह - वैराज्ञ एक साथ एक बुद्धिमें नहीं बसते " " Fascination and renunciation donot stay together at a time in intellect " ** ऊपर ब्यक्त सूत्र ध्यान सूत्र है इसे आप अपनीं बुद्धिमें बसायें और जबभी मौका मिले संसारको समझनेंका , आप इसे प्रयोग कर सकते हैं । भोग - तत्त्वों जैसे काम , कामना , क्रोध , लोभ , भय , आलस्य , मोह और अहंकार की समझ ही मायाकी समझ है तथा माया की समझ माया मुक्त करती है । मायामुक्त योगी प्रभुसे परिपूर्ण होता है ~~~ ॐ ~~~

गीता श्लोक - 6.1

●● गीता श्लोक - 6.1 ●● अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः सः संन्यासी च योगिः ................ " कर्मफल आश्रय रहित कर्म जो कर रहा है वह संन्यासी और योगी है " ** अर्जुन अध्याय - 5 के प्रारम्भ में प्रश्न करते हैं , संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनः योगं च शन्ससि एतयो: यत् श्रेयः एतयो: एकं तत् मे ब्रूहि सुनिश्चितम् " हे कृष्ण ! आप कभीं कर्म संन्यासकी तो कभीं कर्म योगकी प्रशंसा करते हैं , आप मुझे उस एकको बताएं जो मेरे लिए श्रेय हो " °° प्रभु इस प्रश्नके सन्दर्भ में 60 श्लोकोंको बोलते है ( श्लोक - 5.2 - 6.32 ) और श्लोक 6.1 उनमें 29वां श्लोक है । ^^ अर्जुन के प्रश्न - 5 के सन्दर्भ में गीता अध्याय - 5 के श्लोक 5.6 , 5.10 , 5.11 महत्वपूर्ण हैं जो कह रहे हैं ----- > कर्मयोगके बिना कर्मसंन्यास दुःखमय होता है । > आसक्ति रहित कर्म , कर्म योग का फल है । > कर्म योगी समभाव में रहता है । * आसक्ति रहित कर्मके लिए देखें --- 1- गीता -18.49 , 17.50 2 भागवत : 8.1.14 गीता कह रहा है : आसक्ति रहित कर्म नैषकर्म्य की सिद्धिमें पहुंचता है जो ज्ञान योगकी परानिष्

●●तत्त्व ज्ञान ●●

●● तत्त्व ज्ञान ●● °1- लिंग शरीर क्या है ? स्थूल देह का पिंड , 05 कर्म इन्द्रियाँ और मन का योग , लिंग शरीर कहलाता है : भागवत - 11.22 °2- महत्तत्त्व क्या है ? 2.1> तीन गुणोंमें ( मायामें ) कालका प्रभाव महत्तत्त्वका निर्माण करता है । भागवत : 3.26 2.2 > महत्तत्त्व और कालसे तीन अहंकार निर्मित होते हैं जिनसे एक जीवके सभीं तत्त्व बनते हैं । भागवत : 2.5 °3- मन का निर्माण कैसे हुआ ? 3.1> सात्त्विक अहंकार और कालसे मन की उत्पत्ति है ।भागवत : 2.5+3.5+3.6+3.25+3.26+3.27 3.2> राजस अहंकार और काल से 10 इन्द्रियाँ + बुद्धि + प्राण की उत्पत्ति हुयी 3.3> ताम अहंकार और कालसे 05 तन्मात्र और 05 महाभूतोंकी उत्पत्ति हुयी 3.4 > 05 महाभूत + 05 तन्मात्र + 11 इन्द्रियाँ + बुद्धि + अहंकार + 03 गुणों से ब्रह्माण्ड और देहके पिंडका निर्माण हुआ 3.5 > ब्रह्माण्ड और जीव विज्ञानमें वायु और आकाश का योगदान महत्वपूर्ण है । प्राकृतिक प्रलयमें वायु पृथ्वीसे गंध लेकर उसे जलमें बदलती है । वायु जलसे उसका गुण रस लेकर अग्नि ( तेज ) में बदलती है । अन्धकार अग्नि से उसका रूप लेकर उसे आकाश में बदल देता

दुःख संयोग वियोगः योगः

●●दुःख संयोग वियोगः योगः●● गीतामें प्रभु श्री कृष्ण कह रहे हैं --- " दुःख सयोग वियोगः इति योगः " ये श्री कृष्ण वही हैं जो 11 सालकी उम्र तक मथुरासे नन्द गाँव ,नन्द गाँवसे वृन्दावन और नन्द गाँव से बरसाना तक बासुरिकी धुन और रासको योग का माध्यम बनाया था और महाभारतके समय जब उनकी उम्र 80 साल से ऊपर की रही होगी तब कहते हैं ----- " सिद्धानां कपिलः मुनिः अहम् अस्मि " गीता 10.26 कपिल मुनि सत युगके प्रारंभमें स्वयाम्भुव मनुकी पुत्री देवहूति और कर्मद ऋषिके पुत्र रूप में श्री विष्णु भगवानके पांचवें अवतार के रूप में जन्म लिया था । कर्मद ऋषि विन्दुसरमें 10,000 साल की तपस्या किया था । विन्दुसर अहमदाबाद -उदयपुर मार्ग पर अहमदाबादसे 130 किलो मीटर दूर है जो कभीं तीन तरफसे सरस्वती नदीसे घिरा हुआ क्षेत्र होता था और जिसे सरस्वती जल देती थी ।प्रभु श्री कृष्ण 125 वर्ष की उम्र में यदु कुल का अंत करके अपनें परम धाम की यात्रा की थी । कपिल मुनि अपनी माँ की कैवल्य प्राप्ति की इच्छाको पूरा करनें हेतु उनको सांख्य योगका ज्ञान दिया था । यह योग सत युगके प्रारम्भ में पैदा हुआ और द्वापर के अंत

भागवतकी सृष्टि - प्रलय गणित

●● सृष्टि - प्रलय - सृष्टि ●● °° सन्दर्भ - भागवत :---- 2.5+3.5+3.6+3.25-3.27+11.24+11.25 * ब्रह्मा , मैत्रेय , कपिल और कृष्णके सांख्य तत्त्व ज्ञानका सार :---- ^ माया पर कालका प्रभाव हुआ फलस्वरुप ^ 03 अहंकार उपजे > सात्त्विक अहंकारसे कालके प्रभावसे --- मन + 10 इन्द्रियोंके अधिष्ठाता 10 देवता उपजे   > राजस अहँकारसे कालके प्रभावसे ----- 10 इन्द्रियाँ + बुद्धि + प्राण उपजे > तामस अहंकारसे कालके प्रभावसे ---- ° शब्द उपजा ° शब्दसे आकाश उपजा ° आकाशसे स्पर्श ° स्पर्शसे वायु ° वायुसे रूप ° रूपसे तेज ° तेजसे रस ° रससे जल ° जल से गंध ° गंधसे जल उपजा अर्थात 05 तन्मात्र और 05 बिषय उपजे और जब तत्त्व प्रलय होती है तब ----- * वायु पृथ्वीसे गंध छीन लेती है * पृथ्वी जलमें बदल जाती है # जलका रस वायु ले लेती है # जल अग्निमें बदल जाता है ¢ अँधकार अग्निसे रूप ले लेता है ¢ अग्नि वायुमें वदल जाती है ^ आकाश वायुसे स्पर्श छीनता है ^ वातु आकाशमें विलीन हो जाती है > काल आकाशसे शब्द ले लेता है > आकाश तामस अहंकारमें बदल जाता है * राजस अहंकारमें 10 इन्द्रियाँ , बुद्धि , प्राण विलीन

ध्यान और हम

इंद्रियों का स्वभाव है बिषयों में रमण करना  मन का स्वभाव है इंद्रियों पर भरोषा रखना  बुद्धि मन की भाषा को समझती है  और .. . इन सबको जो उर्जा चलाती है वह है तीन  गुणों की उर्जा  सात्विक , राजस और तामस तीन गुणों का माध्यम का नाम है माया  माया  से माया में यह संसार है  यह संसार मन का विलास है  और  इसके परे का आयाक ब्रह्म का आयाम है जहाँ मनुष्य संसार को ब्रह्म की छाया रूप में देखता है / मन - बुद्धि तंत्र की बृत्तयाँ हैं - जाग्रत , स्वप्न और सुषुप्ति  जाग्रत स्थिति में इन्द्रियाँ अपनें - अपनें बिषयों की तलाश में होती हैं  और   इद्रिय - बिषय संयोग भोग है / स्वप्न में ह्रदय जाग्रत अवस्था के अनुभव को प्राप्त करता है और  सुषुप्ति में इन दोनों के अनुभव की लहरें दिखती हैं  जाग्रत , स्वप्न और सुषुप्ति , इनमें गुण कर्ता होते हैं  और  प्रभु की अनुभूति गुणातीत की स्थिति में ही संभव है   फिर क्या करें ? ध्यानका अभ्यास जब गहरा हो जाता है तब इन तीन आयामों से अलग एक और आयाम उठता  है जिसे कहते हैं तुरीय जहाँ गुणों की छाया भी  नही पड़ती  और  वहाँ  जो होता है वह निर्गुण होता है

ज्ञान - विज्ञान

ज्ञान - विज्ञान श्रीमद्भागवत और गीता के आधार पर ज्ञान और विज्ञान की परिभाषा कुछ इस प्रकार से बनती है : * गीता कहता है : क्षेत्र - क्षेत्रज्ञ का बोध , ज्ञान है । * भागवत कहता है : शुद्ध इन्द्रिय , मन और बुद्धि के सहयोग से जो अनुभव होता है वह ज्ञान है और वह अनुभूति जिससे सबको एक के फैलाव स्वरुप देखा जाय , विज्ञान है । दोनों बातों को आप अपनें ध्यान का विषय बनाएं और कुछ दिन का मनन आप को जहां पहुंचाए वहाँ कुछ ठहरिये और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में अकेले होनें की स्थिति को देखते रहें , आप को जो मिले उसे प्रभु का प्रसाद समझ कर स्वीकारें । यह ज्ञान - विज्ञान का ध्यान आप को इन्द्रियों के माध्यम से मन से गुजार कर बुद्धिसे परिचय कराते हुए जहां पहुंचाएगा वह आयाम होगा  विज्ञान का । ~~~ ॐ ~~~

भागवत स्कन्ध तीन ध्यान - सूत्र

Title :भागवत स्कन्ध तीन ( ध्यानसुत्र ) Content: भागवत स्कन्ध - 03 (ध्यानसुत्र) 1- द्रष्टा - दृश्य का अनुसंधान - उर्जा का नाम माया है 2- संसार में दो प्रकार के लोग सुखी हैं - एक बुद्धिहीन और एक स्थिर बुद्धि ब्यक्ति 3- अनात्म पदार्थ हसीन नहीं हैं जैसा प्रतीत होते हैं 4- बिषयों का रूपांतरण काल का आकार है 5- काल प्रभु की चाल है ( 2.1.33 ) 6- ब्रह्म काल चक्र के घुमने की धुरी है 7- विद्या , दान , तप , सत्य धर्म के चार पद हैं 8- बंधन - मोक्ष का कारण मन है 9- ज्ञान मोक्ष का द्वार है 10- भक्ति , वैराग्य , मन की एकाग्रता से ज्ञान प्रकट होता है और ज्ञान से देह में स्थित क्षेत्रज्ञ का बोध होता है 11- जैसे जल से रस पृथ्वी से गंध को अलग करना संभव नहीं वैसे प्रकृति से पुरुष को अलग करना संभव नहीं 12- असुर प्रभु के तामस भक्त हैं जो प्रभु को अपनें मन में  द्वेष के कारण धारण किये रहते हैं ~~~ ॐ ~~~

गीता अध्याय - 02

Title :गीता अध्याय - 02 Content: >>गीता अध्याय - 02 << (क) श्लोकों की स्थिति :--- संजय : 03 ; 1, 9,10 , कृष्ण : 63 अर्जुन : 06 ; 4,6,7,8,54, –––---------------------- योग > 72 --------------------------- * 2.1> संजय : करुणा में डूबे , ब्याकुल अर्जिन से प्रभु यह बात कही :--- * 2.2,2.3 > प्रभु :यह असमय में मोह कैसा , जो आर्य पुरुषों द्वारा न आचरित है , न स्वर्ग की ओर ले जाने वाला है और न कीर्ति दिला सकता है अतः ह्रदय की दुर्बलता त्याग कर युद्ध के लिए तैयार हो जा । * 2.4 > अर्जुन : भीष्म एवं द्रोणाचार्य के खिलाफ कैसे लडूं , दोनों पूजनीय हैं (सूत्र-1.25अर्जुन का रथ इन दोनों के सामने ही खड़ा है ) । *2.5 > महानुभाव ! गुरुजनों को न मार कर इस लोक में भिक्षा के माध्यम से जीविकोपार्जन करना उत्तम समझता हूँ । गुरुओ को मार कर उनके खून से सने भोग को ही तो भोगना होगा । *2.6 > मुझे कुछ पाया नहीं चल रहा की युद्ध करू या न करू , इन दो में कौन उत्तम है , कौन जीतेगा और कौन हारेगा , कुछ पता नहीं चल पा रहा , धृत राष्ट्र के पुत

सांख्य योग से सत्य की ओर

भारत में हमारे बुद्धिजीवी [ ऋषि - मुनि ] उसकी तलाश के नये - नये मार्ग तलाशे जिसे आज के कण वैज्ञानिक प्रयोग शाला में तलाश रहे हैं / भारत प्रभु को केन्द्र मान  कर मनुष्यों की दो श्रेणियाँ बनायी - आस्तिक और नास्तिक / आस्तिक श्रेणी में ऐसे लोग आते हैं जो ब्रह्माण्ड के होनें और ब्रह्माण्ड की सभीं सूचनाओं के होनें का कारण एक शक्ति को मानते हैं जिसे परमात्मा कहते हैं /नास्तिक वर्ग के लोगों में परमात्मा के होनें की सोच नहीं होती , उनकी सोच ठीक वैसी होती है जैसी सोच आज के वैज्ञानिकों की है / वैज्ञानिक समुदाय पिछले तीन सौ साल से दो भागों में बता हुआ दिखता है ; एक वर्ग परमात्मा के अस्तित्व को स्वीकारता है लेकिन उसे कर्ता रूप में न देख कर एक नियम के रूप में देखता है जैसे आइन्स्टाइन और दूसरा वर्ग पूर्ण रूपेण नास्तिक वर्ग है / आस्तिक वर्ग में न्याय , सांख्य , वैशेषिक , योग , पूर्व मिमांस , वेदान्त - ये 06 मार्ग विकशित हुए लेकिन धीरे - धीरे इनमें बदलाव आता गया / न्याय और सांख्य दोनों मार्गों को मिला दिया गया और सांख्य भी धीरे - धीरे लुप्त होता चला गया / भागवत की रचना द्वापर के अंत की है ,  भागवत