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Showing posts from October, 2009

अर्जुन का प्रश्न - 10

अर्जुन कहते हैं------हे प्रभू ! आप स्वयं के बारे में जो कह रहे हैं वह सत्य है , अब मैं मोह रहित हूँ पर आप का ऐश्वर्य रूप देखना चाहता हूँ ----गीता श्लोक 11.1....11.4 तक । उत्तर में हमें गीता श्लोक - 11.5 से 11.30 तक को देखना है , यहाँ इन गीता के 26 श्लोकों में श्री कृष्ण के चार श्लोक, संजय के छः श्लोक और अर्जुन के सोलह श्लोक हैं । अर्जुन अपनें को छिपानें में लगे हैं और मोह ग्रसित की यह पहचान भी है । अर्जुन यह कह तो रहे हैं की आप जो कह रहे हैं वह सत्य है लेकिन उनकी यह बात ऊपर - ऊपर से निकल रही है । अभी ऐश्वर्य रूपों को देखा भी नही क्योंकि उनको अभी दिब्य चक्षु [ गीता- 11।8] मिलनीं हैं और बिना उनके निराकार को कैसे देखा जा सकता है ? अभीं तक ; अध्याय पाँच , सात, आठ , नौ तथा दस में कुल अपनें 114 रूपों को दिखा चुके हैं लेकिन अर्जुन को तृप्ति नहीं मिल पायी है । अर्जुन स्वयं को भ्रम-मोह रहित मानते हैं तथा श्री कृष्ण को परम ब्रह्म भी मानते हैं पर उनके प्रश्न पूछनें का सिलसिला जारी है । आप नें अर्जुन के प्रश्न 09 को देखा--अर्जुन कहते हैं --- आप भूतों के ईश्वर , परम ब्रह्म हैं और यह भी पूछ

अर्जुन का प्रश्न - 9

प्रश्न -- हे भूतों के उत्पत्ति करता, जगत पति , देवों के देव , भूतों के ईश्वर , पुरुषोत्तम आप परम पवित्र परम धाम एवं परम ब्रह्म हैं । आप की बातों को सुनकर और सुननें की चाह उत्पन्न हो रही है अतः आप मुझें बताएं की मैं आप को किन-किन भावों में मनन करुँ ? उत्तर -- प्रश्न की बातों को आप अच्छी तरह से देखलें , अर्जुन जो कुछ भी कह रहे हैं क्या उसके बाद भी कोई और जाननें की गुंजाइश है ? गीता में श्री कृष्ण 100 से भी अधिक श्लोकों के माध्यम से 150 से भी कुछ अधिक उदाहरणों से अर्जुन को परमात्मा पर केंद्रित करनें का प्रयत्न करते हैं लेकिन उनका यह प्रयत्न बेकार जाता है तो क्या आप समझते हैं , हम- आप हनुमान चालीसा पढ़ कर परमात्मा केंद्रित हो पायेंगे ? श्री कृष्ण गीता -अध्याय 5,7,8 तथा 9 में 40 उदाहरणों से स्वयं को परमात्मा बतानें का प्रयत्न करते है लेकिन यह प्रयत्न विफल हो जाता है और प्रश्न - 9 के सन्दर्भ में पुनः 78 उदाहरणों की मदद से अर्जुन को परमात्मा केंद्रित करनें की कोशिश करते हैं लेकिन यह प्रयत्न भी कामयाब नहीं हो सका। श्री कृष्ण जैसा सांख्य - योगी अर्जुन जैसे ब्यक्ति को जो स्वयं एक साधक है

अर्जुन का प्रश्न - 8, भाग ...5

सन्दर्भ श्लोक -- 10.1 से 10.16 तक * भ्रम में अटके को प्रीति की हवा छू नहीं सकती , प्रेमी को भ्रम हो नही सकता और ........ परम-प्रेमी में परमात्मा बसता है । * भ्रम प्रश्न की जननी है , अंहकार भ्रम को पालता है और ........... भ्रम राजस- तामस गुणों की छाया है । * गीता कहता है....श्लोक 6.27, 3.37, 2.52--राजस- तामस गुणों को धारण करनें वाला कभीं भी परमात्मा से नही जुड़ सकता। * प्रश्न रहित ब्यक्ति निर्विकल्प-योग में [ गीता- 10.7 ], बुद्धि-योग में [ गीता- 10.10 ] एवं समत्व- योग [ गीता-2.47 से 2.51 तक ] में होता है जहाँ उसके मन-बुद्धि एक शांत झील की तरह होते हैं। अब हम ऊपर दिए गए मूल बातों के आधार पर गीता के कुछ सूत्रों को देखते हैं जो इस प्रश्न -८ से सम्बंधित हैं # श्लोक - 10.4-10.5 + 7.12, 7.13 श्री कृष्ण कहते हैं ...सभी भाव मुझसे उठते हैं लेकिन उन भावों में मैं नहीं होता तथा मुझमें वे भाव भी नहीं होते। # श्लोक- 10.8 , 10.20 , 10.32 , 7.10 , 9.18 जो था , जो है , जो होगा सब का आदि मध्य एवं अंत , मैं हूँ । # श्लोक- 10.7 , 10.9--10.11 , 2.56 , 5.24 ,6.29-6.30 श्री कृष्ण कहते हैं .....स

अर्जुन का प्रश्न - 8 भाग....4

इस भाग में हम गीता के 34 श्लोकों [गीता श्लोक 9.1--9.34 तक ] को देखनें जा रहे हैं । गीता मूलतः साँख्य- योग आधारित है अतः इनमें दीगई बांते सांख्य आधारित ही हैं। आज लोग गीता तो पढ़ते हैं लेकिन इसकी गणित को भूल चुके हैं और इस कारण से गीता लोगों के अन्दर आसानी से नहीं पहुंच पाता। देखिये गीता सूत्र ----7. 7 , 9.6 - 9.7 , 8.17- 8.19 , 9.4- 9.5 , 7.4- 7.6 , 13.5- 13.6 , 13.19 , 14.3- 14.4 , 15.16 जब आप इन श्लोकों में रमेंगे तो जो मीलेगा वह कुछ इस प्रकार होगा---- जो कुछ भी ब्याप्त है , जो कुछ हम जानते हैं या जान सकते हैं वह सब प्रकृति- पुरूष के योग का फल है । परमात्मा से परमात्मा में तीन गुणों की माया से दो प्रकृतियाँ हैं जिनमें अपरा के आठ तत्वों में पञ्च महाभूत एवं मन, बुद्धि तथा अंहकार हैं और परा निर्विकार चेतना है। आगे इस प्रश्न के सन्दर्भ में परम श्री कृष्ण अर्जुन को यह बताना छते हैं की वे स्वयं परमात्मा है और इसके लिए कुछ उदाहरणों को इस प्रकार से देते हैं ------ रिग-वेद , यजुर्वेद , साम वेद , ॐ मैं हूँ [ गीता सूत्र - 8.12, 8.13, 9.17, 9.23, 10.22, 10.25] और कहते हैं , यज्ञ में मंत्रों स

अर्जुन का प्रश्न - 8 भाग - 3

अर्जुन के प्रश्न - 8 में हम गीता के 76 श्लोकों में से यहाँ सात श्लोकों [ गीता सूत्र 8.16--8.22 तक ] को देखनें जा रहे हैं जिसमें दो अति महत्वपूर्ण बातें आप को मिलेंगी ; पहली बात आज के कोस्मोलोजी [ cosmology ] से है और दूसरी बात वह है जो कल का विज्ञान बन सकता है , इस बात की कल्पना प्रोफेसर आइंस्टाइन एवं हाकिंग भी करते रहें हैं । पहली बात आज की कोस्मोलोजी आइंस्टाइन के उन विचारों पर आधारित है जिसको उन्होंनें 1916-1917 AD में सोचा था । गीता की कोस्मोलोजी जो गीता के अध्याय - 8 में है उसके सम्बन्ध में हमें तीन और श्लोकों [ 3.22,13.33,15.6] को भी देखना चाहिए । गीता पूरे ब्रह्माण्ड को तीन लोकों में देखते हुए कहता है ---मृत्यु-लोक, देव-लोक तथा ब्रह्म-लोक में ऊर्जा का माध्यम सूर्य है लेकिन इन तीनों लोकों से परे परम धाम है जो स्व प्रकाशित है । परम धाम को छोड़ कर अन्य तीन लोक पुनरावर्ती हैं अर्थात ये जन्म-जीवन - मृत्यु से प्रभावि़त हैं । आज ये लोक हैं जो धीरे-धीरे समाप्त हो रहे हैं और कहीं और बन भी रहें हैं। आज विज्ञान नयी पृथ्वी की तलाश में शनि के चन्द्रमा टाइटन तक जा पहुँची है। वैज्ञानिक

अर्जुन का प्रश्न- 8 , भाग- 2

अर्जुन के प्रश्न - 8 का उत्तर तो प्रथम भाग में मिल चुका है लेकिन प्रश्न एवं उत्तर के रूप में हम यहाँ पूरी गीता देखनें जा रहे हैं अतः इस प्रश्न से सम्बंधित 76 श्लोकों [ श्लोक 8.3---10.16 तक ] को देखेंगे । यहाँ इस अंक में हम श्लोक 8.6--8.15 तक को ले रहे हैं । गीता के इन दस श्लोकों में दो बातें प्रमुख हैं ; आत्मा का नया शरीर धारण करना एवं प्राण छोड़ते समय की ध्यान-विधि । श्लोक 8.6 , 15.8 : ये दो श्लोक कहते हैं ---आत्मा जब शरीर छोड़ कर गमन करता है तब इसके संग मन भी रहता है और मन में संग्रह की गयी सभी अतृप्त कामनाएं आत्मा को वैसा शरीर धारण करनें के लिए विवश करती हैं जैसा शरीर उनको चाहिए । गीता कहता है ......आखिरी श्वाश भरनें से पहले अपनें मन को पूरी तरह से रिक्त करदो जिस से मोक्ष मिल सके । रिक्त मन-बुद्धि का दूसरा नाम चेतना है जिसका सीधा सम्बन्ध ब्रह्म से होता है । श्लोक 8.12--8.13 : इन दो सूत्रों के माध्यम से गीता उस ध्यान-विधि को बता रहा है जीसको स्थिर बुद्धि वाला योगी अंत समय में करता है । जो यहाँ ध्यान-विधि दी जा रही है वैसा ध्यान जैन परम्परा में भी है तथा तिबत में इसको बार्दो-ध्य

अर्जुन का प्रश्न- 8, भाग- 2

अर्जुन का प्रश्न - 8 ...भाग- 1

अर्जुन पूछते हैं [ गीता-श्लोक ..8-1 , 8.2 ] ---हे पुरुषोत्तम! ब्रह्म क्या है?, अध्यात्म क्या है?, कर्म क्या है? अधिभूत क्या है?, अधिदैव क्या है?, अधियज्ञ कौन है?और वह शरीर में किस तरह है ? तथा अंत समय में आप को कैसे स्मरण करना चाहिए ? ऐसा प्रश्न वह भी उस समय जब युद्ध के बादल हर पल सघन हो रहेहों , कुछ असामयीक लगता है । इस प्रश्न के सम्बन्ध में हमें गीता के 76 श्लोकों को देखना है [ गीता- 8.3 से 10.16 तक ] । अर्जुन के प्रश्न- 2 एवं 5 में कर्म , कर्म-योग , कर्म-संन्यास तथा ज्ञ्यान की बातें बताई गयी हैं लेकिन कर्म की परिभाषा यहाँ दी जा रही है , क्या यहबात आप को उचित लगती है? अब आप प्रश्न का उत्तर देखिये -------परम कहते हैं ............ परम अक्षर - ब्रह्म है [ अक्षर का अर्थ है सनातन ] , मनुष्य का स्वभाव -अध्यात्म है , जिसके करनें से भावातीत की स्थिति मिले वह कर्म है , टाइम स्पेस में स्थित सभी सूचनाएं अधिभूत हैं, ब्रह्मा अधिदैव हैं और विकार सहित देह में स्थित आत्मा रूप में विकार रहित परमात्मा अधियज्ञ हैं , अब प्रश्न की आखिरी बात को समझना है जिसको हम अगले अंक में लेंगे । ====ॐ======

अर्जुन का प्रश्न - 7

अर्जुन अपनें सातवें प्रश्न में पूछते हैं .....श्रद्धावान पर असंयमी योगी जब योग खंडित स्थिति में शरीर छोड़ता है तब उसकी क्या गति होती है [ गीता-श्लोक ...6.37- 6.39 तक ] ? उत्तर के लिए आप देखें गीता के निम्न श्लोकों को ----- 2.42- 2.46 , 2.3 , 2.37 , 6.40- 6.47 , 7.1- 7.30 , 8.6 , 9.13 - 9.15 , 9.20 -9.22 , 12.3 - 12.4 , 13.5 - 13.6 , 13.19 , 14.3 - 14.4 , 15.8 , 16.1 - 16.3 अर्जुन इस प्रश्न के पहले श्री कृष्ण के 556 श्लोकों में से 206 श्लोकों को सुन चुके हैं । अर्जुन को अब ऐसा लगनें लगा है --वे असंयमी योगी की तरह हैं और उनका योग खंडित होता दिख रहा है । श्री कृष्ण [ गीता..6.40 ] के माध्यम से कहते हैं ---परमात्मा केंद्रित ब्यक्ति की कभी दुर्गति नहीं होती । योग एक अंतहीन यात्रा है । योग खंडित योगी दो प्रकार के हो सकते हैं ; एक वे हैं जो अभी बैराग्यावस्था तक नहीं पहुंचे होते और उनका योग खंडित हो जाता है तथा इस दशा में उनके शरीर का अंत हो जाता है , ऐसे योगी कुछ समय स्वर्ग में निवास करते हैं और फ़िर किसी अच्छे कुल में जन्म ले कर साधना में लग जाते हैं । दूसरी श्रेणी में ऐसे योगी आते हैं जो ब

अर्जुन का प्रश्न - 6

अर्जुन गीता-श्लोक 6.33-6.34 के माध्यम से जानना चाहते हैं ..... मन जिसकी गति वायु से भी अधिक है , उसे शांत कैसे करें ? परम श्री कृष्ण अपनें श्लोक 3.37 में कहते हैं ....यह काम अभ्यास एवं वैराग्य से सम्भव है । गीता में परम श्री कृष्ण के पूरे 556 श्लोकों का सीधा सम्बन्ध मन - साधना से है जिनसे यह पता चलता है - अभ्यास क्या है और बैराग्य क्या है । गीता में श्री कृष्ण के सभी उत्तर ऐसे हैं जिनसे भ्रम दूर नहीं होता अपितु भ्रम और गहरा जाता है । प्रोफेसर अलबर्ट आइंस्टाइन कहते हैं---जो बुद्धि प्रश्न बनाती है उस बुद्धि में उस प्रश्न का हल नहीं होता और यही बात गीता - सूत्र 2.41 भी कहता है। अब हमें गीता - श्लोक 6.37 के बारे में देखना चाहिए । अभ्यास एवं बैराग्य दो अलग- अलग कर्म नहीं हैं , साधना में अभ्यास के फल के रूप में बैराग्य मिलता है जो प्रभु का प्रसाद है । बैराग्य का अर्थ यह नही है की घर से भागकर किसी तीर्थ में पहुँच कर सन्यासी वस्त्र को धारण करलेना । आपनें कबीर की इस पंक्ति को जरुर सूना होगा----मन न रंगाये , रंगाये योगी कपडा और यही बात गीता में श्री कृष्ण भी कहते हैं। गीता-सूत्र 2.5

अर्जुन का प्रश्न - 5

अर्जुन पूछ रहे हैं ---- आप कर्म-योग एवं कर्म-संन्यास दोनों की बातें बता रहे हैं लेकिन इन दोनों में मेरे लिए कौन सा उत्तम है, कृपया मुझे बताएं ? उत्तर को प्रश्न - 2 के उतर केसाथ बताया जा चुका है लेकिन यहाँ गीता के 60 श्लोकों [5.2-5.29 , 6.1-6.32] तक को देखना चाहिए । गीता में कर्म, कर्म-योग , कर्म- संन्यास एवं ज्ञान का एक समीकरण दिया गया है जो टुकडों में बिभिन्न अध्यायों में बिभक्त है , जो इस समीकरण को खोज लिया वह बन गया गीता - योगी । गीता कहता है की बाहर से देख कर यह समझना काफी कठिन है की कौन भोगी है और कौन योगी है क्योंकि एक ही काम को भोगी - योगी दोनों करते हैं । भोगी के कर्म के पीछे गुन-तत्वों का प्रभाव होता है और योगी के कर्म प्रकृति की जरुरत के लिए होते हैं । गीता कहता है --जो गुणों को करता देखता है वह है द्रष्टा-साक्षी [ गीता सूत्र - 14.19 , 14.23 ]और करता-भाव तो अंहकार की छाया है [ गीता-सूत्र 3।27] , आइये ! अब कुछ और श्लोकों को देखते हैं । योगी- सन्यासी के कर्म संकल्प एवं चाह रहित होते हैं [गीता-सूत्र 6.1,6.2,6.4] तथा योगी-सन्यासी स्वयं का मित्र होता है [गीता-सूत्र 6।6] , इन

अर्जुन का प्रश्न - 4

अर्जुन पूछते हैं......आप सूर्य को काम-योग के सम्बन्ध में कैसे बताया होगा क्योकि सूर्य का जन्म कल्प के प्रारंभ में हुआ है और आप वर्तमान में हैं ?-----गीता- श्लोक 4।4 उत्तर के लिए योंतो श्लोक 4.5 पर्याप्त है लेकिन यहाँ हमें देखना है अध्याय- 4 के पूरे श्लोकों को जो संख्या में 42 हैं । श्लोक 4.5 में श्री कृष्ण कहते हैं.....पहले तेरे और मेरे अनेक जन्म हो चुके हैं, तूं अपनें पूर्व जन्मों को इस समय नहीं जानता पर मैं अपनें पूर्व जन्मों को जानता हूँ । गीता श्लोक 2.12 में श्री कृष्ण कहते हैं..... यहाँ उपस्थित सभीं लोगों के पहले अनेक जन्म हो चुके हैं और भविष्य में भी इन सबका जन्म होगा फ़िर जो भीं मरनें वाले हैं उनके लिए क्या सोच कारना ? , यहाँ अर्जुन चुप रहते हैं लेकिन अध्याय चार में चुप नहीं रहते , ज्योंही मौका मिला , पूछ बैठे की आप सूर्य को कैसे काम-योग को बता सकते हैं ? मोह- भय में ज्ञान के ऊपर अज्ञान की चादर चढी होती है , मन-बुद्धि अस्थिर हो जाते हैं और ऐसा ब्यक्ति यह नहीं समझता की वह क्या बोल रहा है ? स्मृतियों में वापिस जानें के सम्बन्ध में महावीर एवं बुद्ध क्रमशः जातिस्मरण तथा आलय विज

अर्जुन का प्रश्न - 3

अर्जुन [ गीता श्लोक 3.36 ] पूछते हैं--मनुष्य न चाहते हुए भी पाप क्यों करता है ? प्रश्न का यथा उचित उत्तर तो श्लोक 3.37 से मिल जाता है लेकिन यहाँ हम देखनें जा रहे हैं श्लोक 3.37- 3.43 तथा श्लोक 4.1-4.3 तक को । प्रश्न के उत्तर में पहुंचनें से पूर्व हम इसे देखते हैं ------ प्यार की तरंगे ह्रदय में उठती हैं... आत्मा- परमात्मा भी ह्रदय में रहते हैं.... प्यार की तरंगे जब मन को छूती हैं ....... तब निर्विकार प्यार वासना बन जाता है । अर्जुन अपनें पहले प्रश्न में स्थिर -प्रज्ञ को जानना चाहते थे , प्रश्न दो में कर्म -ज्ञान को समझना चाहते थे और अब पाप होनें के कारण को जानना चाहते हैं । गीता जैसे - जैसे आगे बढ़ रहा है अर्जुन की बुद्धि और भ्रमित होती जा रही है । परम श्री कृष्ण कहते हैं --मनुष्य काम के सम्मोहन में आकर पाप करता है [गीता - 3.37 ] लेकिन यहाँ हम कुछ और सूत्रों को भी देखेंगे जिस से काम-रहस्य को भी समझा जा सके । गीता में काम को समझनें के लिए हमें श्लोक --3.37 , 5.23 , 5.26 , 16.21 ,तथा श्लोक 3.38 से 3.43 तक को भी देखना चाहिए जिनमें काम नियंत्रण की ध्यान बिधि बताई गई है .गीता में श्री कृष्ण

अर्जुन का प्रश्न - 2

यदि आप कर्म से उत्तम ज्ञान को समझते हैं तो फ़िर मुझे कर्म के लिए क्यों प्रेरित कर रहें हैं ?---श्लोक-3.1,3.2 अर्जुन का अगला प्रश्न गीता श्लोक - 3.36 से है अतः उत्तर श्लोक 3.3--3.35 में सिमित होना चाहिए । प्रश्न -2 और प्रश्न-5 एक दूसरे के परिपूरक हैं अतः यहाँ हमें गीता-श्लोक 3.3-3.35, 5.2-5.29, 6.1-6.32 अर्थात कुल 93 श्लोकों को देखना चाहिए । कर्म, कर्म-योग, ज्ञान तथा कर्म-संन्यास का समीकरण को समझनें के लिए 93 श्लोकों में से निम्न श्लोकों को गहराई से पकडनें से गीता- मर्म में प्रवेश मिल सकता है ............. 3.4- 3.7 , 3.17 , 3.19-3.20, 3.25-3.29, 3.33-3.34 5.6-5.7 , 5.10-5.12 , 5.14-5.15 , 5.22-5.24 , 5.26-5.28 6.1-6.4 , 6.7 , 6.11-6.14 , 6.16-6.17 , 6.19 , 6.25 , 6.26-6.30 अब आप उठाइये गीता और लग जाइए इन श्लोकों की साधना में और जो आप को मिलेगा वह होगा सत जीवन का मार्ग। आप गीता- तत्त्व - विज्ञान से गीता को समझनें की भूल न करना गीता तत्त्व विज्ञानं मात्र आप को गीता के करीब ले आनें का प्रयाश है। यहाँ दिए गए श्लोकों के आधार पर गीता का कर्म, कर्म-योग , ज्ञान एवं कर्म- संन्यास का जो विज्ञानं न

अर्जुन का प्रश्न- १ [ श्लोक...२.५४ ]

गीता में अर्जुन के 16 प्रश्नों को पहले दिया जा चुका है , अब हम उन प्रश्नों को ले रहे हैं और प्रश्न-उत्तर के माध्यम से गीता अध्याय- 2 से अध्याय-18 तक को देखनें जा रहे हैं। हम सब की यह यात्रा बिषय से बैराग्य तक की यह यात्रा कितनी कामयाब होती है यह हमारी श्रद्धा पर निर्भर है । प्रश्न ... स्थिर प्रज्ञयोगी की पहचान क्या है? जिसको समाधी के माध्यम से परमात्मा की अनुभूति हुयी होती है । उत्तर... उत्तर के लिए परम श्री कृष्ण 18 श्लोकों को प्रयोग करते हैं [2.55--2.72 तक ] । अध्याय दो में तीन बातें समझनें के लिए हैं ; इन्द्रिय - सुख में दुःख का बीज होता है [ गीता-2।14।, 2।15 ,5.22 , 18.38 ] , समत्व-योगी ---- स्थिर-प्रज्ञ होता [गीता 2.47..2.50 तक] है और आत्मा क्या है [ गीता- 2.18...2.30 तक ] ? गीता में श्री कृष्ण से मिलनें के लिए जरुरी है अर्जुन को समझना क्योंकि अर्जुन ठीक हम-आप जैसे मोह-भय ग्रसित ब्यक्ति हैं जो हर पल अपना रंग बदलते रहते हैं । अर्जुन को इतना तो पता है की स्थिर प्रज्ञ को समाधि का अनुभव होता है और वह परमात्मा को पा चुका होता है लेकिन फ़िर स्थिर प्रज्ञ की पहचान पूछ रहें हैं । आत

गीता-अमृत बूंदे---भाग-२

पहले आप इस श्रृंखला के अंतर्गत गीता से कुछ अमृत - बूंदों का आनंद उठाया अब कुछ और बूंदे आप को सादर सेवार्पित हैं । १- गीता-श्लोक 18.40 3.5 3.28 18.11 14.10 गुणों का एक समीकरण हर मनुष्य के अंदर हर पल रहता है जो प्रकृति से ग्रहण की जानें वाली वस्तुओं से हर पल बदलता रहता है । प्रकृति से हम भाव,भोजन , वायु एवं जल ग्रहण करते हैं और प्रकृति में कोई भी ऐसी वस्तुनही जिसमें तीन गुन न होते हों । कोई भी जीव धारी एक पल भी कर्म रहित नहीं रह सकता क्योंकि कर्म गुणों के प्रभाव के कारण होते हैं । गुणों से स्वभाव बनता है और स्वभाव से कर्म होते हैं । जब एक गुन उपर उठता है तब अन्य दो गुन मंद पड़ जाते हैं । २- गीता-श्लोक 7.14 7.15 तीन गुणों वाली माया से सम्मोहित ब्यक्ति परमात्मा से दूर भोगों में आसक्त रहता हुआ आसुरी स्वभाव वाला होता है और माया मुक्त ब्यक्ति परमात्मातुल्य होता है । ३- गीता श्लोक 7.24 12.3 12.4 परमात्मा की अनुभूति मन-बुद्धि से परे की होती है । ४- गीता श्लोक 2.42--2.44 तक भोग-भगवान् को एक साथ एक बुद्धि में नहीं रखा जा सकता । ५- गीता श्लोक 4.38 13.2 6.42 7.3 7.19