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Showing posts from February, 2021

अष्टांगयोग साधना में ब्रह्मचर्य क्या है ?

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  अष्टांगयोग साधना में ब्रह्मचर्य यम का चौथा अंग है। महर्षि ब्रह्मचर्य के सम्बन्ध में केवल इतना कहते हैं कि   ब्रह्मचर्य में रहने से वीर्य लाभ होता है । देखिये महर्षि के सूत्र को सूत्र के भावार्थ को ।

पतंजलि अष्टांगयोग में अस्तेय क्या है ?

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  पतंजलि अष्टांगयोग के पहले अंग यम का तीसरा तत्त्व अस्तेय👇 👌अस्तेय का भाव है तन , मन और बुद्धि स्तर पर चोरी सम्बंधित भाव का निर्मूल हो जाना । 👉त् चोरी करना , चोरी करवाना , चोर के समर्थन के पक्ष में सोचने जैसे भाव का अंतःकरण से निर्मूल करानें का अभ्यास अस्तेय साधना है। 👉पतंजलि अपनें अष्टांगयीग के आठ अंगों में यम को पहला स्थान देते हैं । यम का अर्थ होता है अभ्यास करना । अष्टांगयोग का दूसरा अंग है नियम । नियमके 05 अंगों के पालन करनें का अभ्यास करना होता है । अस्तेय साधना के बाद ब्रह्मचर्य साधना और अपरिग्रह की साधना का स्थान है । 👌यम - नियम साधना की सिद्धि मिलने पर अष्टांगयोग के तीसरे अंग आसन की सिद्धि करनी होती है । 🐧परम सत्यको देखने की ऊर्जा प्राप्त करने की यात्रा का नाम है , अस्तेय । //ॐ //

पतंजलि अष्टांगयोग में सत्य की परिभाषा

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  योग - परिचय के सम्बन्ध में यह 28 वां अंक है । यहाँ हम पतंजलि अष्टांगयोग के पहले अंग के दूसरे तत्त्व सत्य की परिभाषा को देख रहे हैं । पतंजलि समाधि पाद सूत्र : 36 में कह रहे हैं कि सत्य में प्रतिष्ठित क्रिया - फल का आश्रय होता है अर्थात ऐसा योगी कर्म करने से पहले उस कर्म के फल को देख लेता है। अब देखते हैं निम्न स्लाइड को 👇

पतंजलि योगसूत्र में अहिंसा क्या है ?

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योग क्या है ? का यह 27 वां अंक है । यहाँ हम अष्टांगयोग के पहले अंग यम के पहले तत्त्व अहिंसा को पतंजलि योग सूत्र के आधार पर समझ रहे हैं ।

योग क्या है ? भाग : 26 , अष्टांगयोग में यम - नियम

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  योग क्या है ? भाग : 26  अष्टांगयोग के अंग यम - नियम क्रमशः योग क्या है ? इस श्रंखला के अंतर्गत सातवें प्रकार के योग अष्टांग योग को हम यहाँ समझ रहे हैं । अष्टांगयोगके 08 अंगों में प्रथम दो अंग क्रमशः यम और नियम हैं।  यम अर्थात अभ्यास करनें के तत्त्व और नियम अर्थात पालन करने के तत्त्व । श्रीमद्भगवद्गीत में प्रवेश करने से पहले प्रकृति - पुरुष रहस्य को समझना आवश्यक है और प्रकृति - पुरुष रहस्य के लिए सांख्य योग की 72 कारिकाओं को समझना पड़ेगा ही तथा सांख्य सिद्धांतोंकी गूढ़ता को बिना पतंजलि योग सूत्रों को समझे , संभव नहीं अतः पतंजलिके 195 सूत्रों को ठीक - ठीक  समझना भी जरुरी है ।  गीता तत्त्व ज्ञान के अंतर्गत गीता में प्रवेश से पहले पतंजलि और सांख्य को हम समझना चाह रहे हैं ।  आइये ! अब हम यम - नियम के अगले अंक को देखते हैं⬇️

पतंजलि योग : अष्टांगयोग : यम - नियम -2

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  योग क्या है ? भाग - 25 के अंतर्गत आज हम यम - नियम साधना अभ्यास के अंतर्गत व्रत और महाव्रत को पतंजलि के शब्दों में समझने का प्रयत्न कर रहे हैं । देखते हैं निम्न स्लाइड को ⬇️

पतंजलि अष्टांगयोग में यम - नियम

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  कपिल मुनि सांख्य दर्शन में सत्य - बोध के लिए जो द्वैत्य वाद का सिद्धांत देते हैं , उसे प्राप्त करने के लिए  द्वैत्य वादी पतंजलि बहुत सुंदर ,संदेह - भ्रम मुक्त निष्कण्टक ऐसा मार्ग दिखाते हैं जिससे परम सत्यकी अनुभूति संभव ही सकती है । प्रकृति - पुरुष इन दो सनातन शक्तियों के योग और प्रभु प्रकाश से सृष्टि है और प्रकृति को भोग कर पुरुष किस प्रकार से पुनः अपने मूल स्वभाव में लौट आता है , को पतंजलि बहुत सुंदर ढंग से प्रस्तुत करते हैं । आइये ! देखते हैं , इस अष्टांगयोग श्रंखला जा अगला अंक⬇️  

पतंजलि अष्टांगयोग भाग - 2

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  योग दर्शन की 23 वें श्रृंखला के अंतर्गत आज हम योग के सातवें प्रकार अष्टांग योग के दूसरे भाग में यम और नियम से परिचित हो रहे हैं। अगले अंक में यह देखेंगे कि यम - निमय साधना सिद्धि से क्या मिलता है ⬇️

पतंजलि का अष्टांग योग भाग - 1

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योग क्या है ?  इस श्रंखला के अंतर्गत आज हम इसके 22 वें भाग में पतंजलि के अष्टांगयोग को पतंजलि के 195 सूत्रों के माध्यम से व्यक्त करने का प्रयाश कर रहे हैं । यहाँ जो भी दिया जा रहा है , उसमें हमारा कुछ नही , ऋषि द्वारा दिए गए सूत्रों को हिंदी भाषान्तर के अंतर्गत यथार्थ रूप में रखने का यह केवल एक छोटा सा प्रयाश भर है । यदि कहीं कोई त्रुटि दिखे तो मुझे क्षमा करें ⬇️ // ॐ //

योग क्या है भाग - 21 ज्ञानयोग - 5

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  योग परिचय श्रंखला का यह 21 वां अंक है । इसके अंतर्गत ज्ञान योगबक यह 5 वां अंग है जिसमें गीता के कुछ श्लोकों के सार को देख रहे हैं । इन श्लोकों का मूल आधार सांख्ययोग और पतंजलियोग दर्शन हैं प्रकृति - पुरुष संयोग से इस संसार श्रुति - दृश्य सूचनाओं की उत्पत्ति है । इस सांख्य दैत्य बादी सिद्धान्त को वेदांत किस तरह से अद्वैतवादी बनाता है ? इसे थीक -ठीक यहाँ समझ जा सकता है ।  ध्यान रखना होगा कि सांख्य दर्शन महाभारतसे अधिक प्राचीन है और गीता महाभारत का एक अंश है।

योग क्या है - 20 ज्ञानयोग - 4

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  योग क्या है ? श्रृंखला में आज हम ज्ञानयोग के चौथे भाग में श्रीमद्भागवत के दो सूत्रों को समझने जा रहे हैं। अगके अंक में ज्ञान के सम्बन्ध में कुछ श्रीमद्भगवद्गीत के श्लोकों  को देखेंगे।

योग क्या है - 18 ज्ञानयोग भाग - 2

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  पिछले अंक में ज्ञान शब्द की उत्पत्ति और ज्ञान प्राप्ति के 05 श्रोतों के रूप में चित्त की 05 वृत्तियों से परिचय हुआ। अब देखते हैं इन 05 वृत्तियों को ज्ञानयोग भाग : 2 और भाग : 3 के अन्यर्गत ⬇️

योग क्या है भाग - 17 ज्ञानयोग - 1

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  योग क्या है ? इस श्रृंखला के अंतर्गत आज हम ज्ञान योग के पहले चरण को देख रहे हैं । ज्ञान शब्द की उत्पत्ति और ज्ञान प्राप्ति के श्रोतों को देखते हैं । आगे चल कर ज्ञान - विज्ञान शब्दों को गीता और भागवत के आधार पर देखा जाएगा 👇

योग क्या है भाग - 16 भक्तियोग - 8

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  अपार भक्ति जब सिद्ध होती है तब परा भक्ति का द्वार स्वतः खुल जाता है । लेकिन जब परा भक्ति में ऊपर की यात्रा में अवरोध खड़े होने लगते हैं और भक्त जहाँ होता है , वहाँ से नीचे की चित्त भूमियों पर सरक आने पर बेसहारा की अनुभूति से गुजरने लगता है तब भक्त की दर्द की लहरें इतनी प्रवल हो जाती है कि वे उसके इष्ट देव ( पिछले जन्म के साधन गुरु ) को छूने लगाती हैं ।  इष्ट गुरु जहाँ भी होता है , वहाँ से चल पड़ता है , शिष्य की मदद करने हेतु। देखिये इस स्लाइड में परमहंस रामकृष्ण जी और अवधूत त्रैलंग स्वामी जी के उदहारण। त्रैलंग स्वामी के लिए भागिरथानंद पटियाला से और परमहंस के लिए तोतापुरी लाहौर से क्रमशः तेलंगाना और दक्षिणेश्वर पश्चिमी बंगाल कैसे आ पहुँचे ?

योग क्या है भाग - 15 में भक्तियोग भाग - 7

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  भक्ति , वैराग्य और ज्ञान के सम्बन्ध को ठीक -ठीक बुद्धि में बैठने के लिये देखें , इस समीकरण को ⤵️ अन्य साधनाओं और भक्ति में क्या फर्क है ?  अन्य साधनों में देह में स्थित परम ऊर्जा मूलाधार चक्र से ऊपर आज्ञा चक्र की ओर ऊपर उठती है और  भक्ति में यह ऊर्जा हृदय चक्र से चल कर विशुद्ध चक्र , आज्ञा चक्र और अंततः सहस्त्रार चक्र के माध्यम से अपनें मूल श्रोत से जा मिलती है ।  देखिये यहाँ निम्न स्लाइड को ⤵️

योग क्या है भाग - 14 , भक्तियोग - 6

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  भक्ति का अपना संगीत है जिसे भक्त अपनें हृदय में हंट रहता है ।  जब यह संगीत सुनाई पड़ना बंद हो जाता है तब वह भक्त एक कस्तूरी मृग जैसा हो उठता है।

योग क्या है भाग- 13 भक्तियोग - 5

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  योग परिचय श्रृंखला में यह 13 वां भाग है जिसमें भक्तियोग सम्बंधित यह पाँचवां अंक है। श्रीमद्भागवत पुराण आधारित भक्ति योग सम्बंधित कथाका  एक अंश प्रस्तुत है जिसमें यमुना जी से कृष्ण पत्नियां कृष्ण - वियोग की चर्चा कर रही हैं। यहाँ देखिये कि वियोग माध्यम से कृष्ण पत्नियां कैसे कृष्ण संयोग की प्राप्ति कर रही हैं !

योग क्या है ? भक्तियोग की अगली कड़ी

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  भक्त कभीं रोता हुआऔर कभीं हँसता हुआ दिखता है , ऐसा क्यो? भक्त भी चित्त माध्य से प्रभु के जुड़ता और बिछुड़ता रहता है । चित्त की  05भूमियाँ हैं ; क्षिप्ति , मूढ़ , विक्षिप्ति , एकाग्रता और निरु।  निरु उच्चतम भूमि है और क्षिप्ति निम्नतम। जब भक्त का चित्त उच्च भूमियों में होता है , उस समय वह परम से जुड़ा होता है और हँसता रहता है । लेकिन जब उसका चित्त नीचे की भूमियों पर होता है , तब रोता है । परम हंस रामकृष्ण जी की समाधि जब टूटती थी तब रोते - रोते गुनगुनाते हुए बोलते थे - माँ ! मैं तो वहीँ थीक था , यहाँ क्यों ले आयी ? यह स्थिति है , उच्च भूमियों से निम्न भूमियों पर चित्त का लौटना ।

योग क्या है ? भक्तियोग भाग - 3

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  जब ब्रह्म ज्ञानी उद्धव जी बृंदाबन में राधा को कहते हैं कि प्रभु श्री कृष्ण मुझे आप सहित सभीं गोपियों के दुःख को दूर करने के लिए योग की शिक्षा देने हेतु यहाँ भेजे हैं , तब राधा कहती हैं , हम में कौन ऐसा कहता है कि हम दुःखी हैं !  हम तो उनसे पूर्ण संयोग चाहते हैं जहाँ -  राधा कृष्ण बन जाय और कृष्ण राधा । इसके अलावा हमें और कोई योग नहीं चाहिए , उद्धव भैया ! 

योग क्या है ? भक्तियोग - 2

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  भक्त बनते नहीं , पैदा होते हैं।  Bhakti is pathless journey.

योग क्या है ? भाग : 9 , भक्तियोग भाग - 1

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  योग क्या है ? इस श्रंखला के अंतर्गत आज हम भक्ति योग को समझ रहे हैं । भक्ति समझने का कोई बिषय नहीं और इसे मन - बुद्धि - अहँकार कार्य क्षेत्र में बाधा भी नहीं जा सकता। भक्ति , भक्त के दिल की धड़कन है जिसे केवल और केवल भक्त सुनता है ।