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Showing posts from September, 2010

गीता मर्म - 36

गीता और सांख्य कपिल मुनि द्वारा जनित लगभग 300 - 200 BCE सांख्य - योग भारत में प्रचलित आस्तिक के छः मार्गों में से एक है । गीता सूत्र - 10.26 में श्री कृष्ण कहते हैं ...... सिद्ध मुनियों में कपिल मुनि , मैं हूँ । आप शोध करें की यह कपिल मुनि सांख्य - योग के जन्मदाता वाले कपिल मुनि हैं या कोई और । भारत में यूनान की तरफ तर्क शास्त्र अति प्राचीन बिषय रहा है । तर्क शास्त्र विज्ञान की जननी है लेकीन भारत में यह आगे न चल पाया । न्याय , वैशेशिका , पुव मिमांस और सांख्य ये चार ऐसे बिषय थे भारत में , जो तर्क आधारित थे और बुद्धि के माध्यम से परम की यात्रा की ऊर्जा के भी श्रोत थे लेकीन भक्ति का यहाँ भारत में ऎसी हवा चली की सब वैज्ञानिक सोच जगानें वाले श्रोत धीरे - धीरे समाप्त होगये । आज कोई वेदान्त को भक्ति में लटका कर घूम रहा है तो कोई न्याय को अन्याय में दबाये फिर रहा है । गीता में लगभग 50 श्लोक ऐसे हैं जो सांख्य के हैं लेकीन उनको कुछ - कुछ बदला गया है । सांख्य कहता है संसार की रचना प्रकृति - पुरुष के योग से है , यह बात गीता भी कहता है । सांख्य परमात्मा के होनें की बात नहीं करता जब की गीता मे

गीता मर्म - 35

सांख्य - योग गीता में सांख्य , ज्ञान , ये दो शब्द बार - बार आप को मिलेंगे , कुछ लोग सांख्य को ज्ञान कहते हैं , लेकीन यह सांख्य है क्या ? ईसा पूर्व लगभग 200 - 300 वर्ष , सांख्य साधना का एक मार्ग था लेकीन आज इसका नाम न के बराबर ही है । भारत के धर्माचार्य लोग जिसको मारना होता है उसकी पूजा करवानें लगते हैं । भागवत पुराण में कृष्ण के अवतार के रूपमें बुद्ध को देखा गया है और शिव पुराण में कहा गया है :----- स्वर्ग और नरक की रचना करनें के बाद प्रभु नरक की जिम्मेदारी यमराज को दिया । जब काफी समय तक नरक में कोई न पहुंचा तो एक दिन यमराज प्रभु के दरबार में उपास्थित हुए और प्रार्थना की :---- प्रभु हमारे पास अभी तक कोई एक भी न आया और स्वर्ग लोक भरा पडा है , मैं अकेले वहाँ क्या करू ? प्रभु बोले , आप चिंता न करें , कलियुग में बुद्ध नाम से मैं आउंगा , लोग मुझे बुद्ध के रूप में पुजेगे और सभी नरक में जायेंगे और आप का नरक हमेशा भरा रहेगा , चिंता करनें की कोई बात नहीं है । आप नें देखा ! बुद्ध को प्रभु तुल्य भी बना दिया और --------- भारत से सांख्य का सफाया कर दिया गया लेकीन गीता का सफाया करना कठिन था जबकि गी

गीता मर्म - 34

गीता से कुछ मणिओं को एकत्रित करें और बैठ कर मजा लें क्यों भागना इधर से उधर ॥ गीता की पांच मणियाँ , आपके लिए जो ------ अस्थिर मन ..... संदेहयुक्त बुद्धि .... खंडित स्मृति ..... मोह , और ......... अज्ञान का समीकरण देते हैं ॥ [क] सूत्र - 18.72 , 18.73 पहला श्लोक प्रभु का गीता में आखिरी श्लोक है जिसमें अर्जुन से पूंछ रहे हैं ..... अर्जुन ! क्या स्थिर मन से तूनें गीता सूना , क्या तेरा भ्रम दूर हुआ , क्या तेरा अज्ञान जनित मोह समाप्त हुआ ? श्लोक - 18.73 गीता में अर्जुन का अंतिम श्लोक है जिसमें अर्जुन कहते हैं ----- प्रभु आप की कृपा से मेरा अज्ञान समाप्त हो गया है , मैं अपनी खोई स्मृत वापिस पा ली है , मेरा मोह भी समाप्त हो गया है और अब मैं आप की शरण में हूँ ॥ [ख] सूत्र - 2.52 प्रभु कहते हैं ...... अर्जुन तूं युद्ध से भागनें की बात तो कर ना , क्योंकि ...... मोह के साथ बैराग्य नहीं मिलता ॥ [ग] सूत्र - 4.35, 10.3 प्रभु कहते हैं ...... ज्ञान से मोह का अंत होता है और परमात्मा के फैलाव रूप में यह संसार दिखनें लगता है और प्रभु मय वह हो उठता है ॥ आप और हम जो कर्म करते हैं उनके पीछे ----- राजस और तामस

गीता मर्म - 33

इन्द्रियाँ , द्वार हैं ------ गीता श्लोक - 5.13 में प्रभु अर्जुन से कहते हैं ....... हे अर्जुन ! वह, जिसके मन में कर्म करनें का भाव नहीं उठता , वह अपनें नौ द्वारों वाले शरीर रुपी महल में चैन से रहता है । पहले नौ द्वारों को देखते हैं ........ 2[आँख , कान , नाक ] + एक मुंह + एक गुदा + एक जननेंद्रिय , इन नौ द्वारों को आप समझें , मैं आगे चलता हूँ । क्या कोई राजा ऐसे किले में रहता हो जिसमें नौ द्वार हों और आनंद से रहता हो , क्या यह संभव है ? क्या आप कोई ऐसा किला देखे हैं जिसमें नौ द्वार हों ? दौलताबाद से दिल्ली तक , द्वारका से गंगा सागर तक, आप जाएँ और उस किले को खोंजे जिसमें नौ द्वार हों और उसमें रहनें वाला राजा परम आनंद में अपना जीवन जीया हो - यह आप के शोध का बिषय बन सकता है , ज़रा सोचना एकांत में । इन्द्रियाँ हमारे देह के द्वार हैं , जिनके माध्यम से हम संसार में कुछ खोजते रहते हैं , जीवन इस खोज में सरकता चला जाता है और वह मिलता है लाखों में किसी एक को वह भी सदियों बाद । प्रभु मार्ग देते हैं , उनको खोजना और उन पर चलाना तो हमें ही है । इन्द्रियों के माध्यम से हमें संसार जो प्रभु का ही फ

गीता मर्म - 32

अर्जुन के दर्द की दवा का नाम गीता है ------ अर्जुन अपनें सारथी श्री कृष्ण से कहते हैं ........ आप रथ को दोनों ओर की सेनाओं के मध्य ले चलें , मैं देखना चाहता हूँ की ----- कौन से लोग मेरी ओर से लडनें के लिए आये हैं और कौन से लोग मेरे बिपरीत हैं , अर्जुन की यह बात उसके अन्दर उठ रही दर्द की लहर है जो शब्दों के माध्यम से बाहर निकल रही है । प्रभु श्री कृष्ण को सब मालूम है , वे एक पल भी नहीं गवाना चाहते , तुरंत रथ को सही जगह ले जा कर खडा करते हैं । अर्जुन को किसको देखना था , वहाँ कौन पराया था , थे तो सभी अपनें ही , क्योंकि युद्ध एक घर के दो परिवारों में होने को है , सभी रिश्ते - नाते दार दोनों पक्ष के ही तो हैं । युद्ध में भाग लेनें वालों में ....... अति बुजुर्ग लोग हैं मध्य उम्र के लोग हैं गुरुजन हैं और ऐसे युवा बच्चे भी हैं जिनका अभी हाल में विवाह हुआ है । अर्जुन अपनें सूत्र -1.28 - 1.30 तक में जो छः बातें कही है जैसे ...... मेरा गला सूख रहा है शरीर में कम्पन हो रहा है त्वचा में जलन हो रही है , आदि , ये सब भय - मोह की पहचान हैं । श्री कृष्ण एक सिद्ध योगी के रूप में अर्जुन की भाव दशा को पहच

गीता मर्म - 31

गीता के दो सूत्र :------ [क] सूत्र - 7.11 रागरहित शास्त्र के अनुकूल , काम , मैं हूँ ॥ [ख] सूत्र - 10.28 संतान उत्पत्ति का कारण , कामदेव , मैं हूँ ॥ काम और काम देव , मैं हूँ , ऎसी बात श्री कृष्ण जैसा योगिराज ही कह सकता है । श्री कृष्ण की इन बातों को हम कुछ समझनें की कोशिश करते हैं , यद्यपि है कठिन , क्यों की :---- श्री कृष्ण की बातों को वह समझता है जिसमें उनकी ऊर्जा ऊर्जा बह रही हो , हम तो भोगी ब्यक्ति हैं । दरिया बहती है - ऊपर से नीचे की ओर और ऊर्जा बहती है अधिक बोल्टेज से कम बोल्टेज की ओर । तरल के बहाव के लिए स्लोप चाहिए और ऊर्जा - बहाव के लिए चाहिए - पोटेंसिअल डिफ़रेंस। ऊपर के सूत्रों में प्रभु कहते हैं -- काम और काम देव , मैं हूँ , यहाँ काम है ऊर्जा या दरिया के बहनें की ऊर्जा और कामदेव है स्लोप एवं पोटेंसिअल डिफ़रेंस । काम को जब काम देव मिलते हैं तब काम ऊर्जा दो दिशाओं में से किसी एक की ओर बह सकती है ; नीचे से ऊपर की ओर या ऊपर से नीचे की ओर । काम देव प्रकृति की चाह है अर्थात संतान उत्पत्ति के लिए काम ऊर्जा को ऊपर से नीचे की ओर बहानें का माध्यम और जब यह काम हो जाता है तब कामदेव शरी

गीता मर्म - 30

गीता का धृतराष्ट्र याद रखना हम गीता के धृतराष्ट्र को देख रहे हैं , किसी और धृतराष्ट्र को नहीं ॥ गीता का प्रारम्भ धृतराष्ट्र के श्लोक से है और यह श्लोक धृतराष्ट्र का पहला एवं आखिरी श्लोक भी है । गीता महाभारत - युद्ध का द्वार है लेकीन इसका इस युद्ध से निमित्त मात्र सम्बन्ध है । गीता को जो महाभारत से जोड़ कर देखता है वह गीता के श्री कृष्ण से कभी नहीं मिल सकता । धृतराश्रा जी अपनें मित्र संजय से पूछते हैं - संजय वहाँ युद्ध स्थल में क्या चल रहा है , हमारे और पांडू - पुत्रों के मध्य ? धृतराष्ट्र जी बस इतना कह कर चुप रहते हैं , गीता का प्रारम्भ तो इस सूत्र से हो गयाऔर संजय के श्लोक से गीता का अंत भी होता है जिसमें संजय कहते हैं ....... राजन ! यह समझना की जहां श्री कृष्ण और अर्जुन की जोडी है , विजय भी उसी पक्ष की होगी । धृतराष्ट्र जी अंधे ब्यक्ति हैं , संजयजी उनकी मदद के लिए उनके पास हैं , उनके मित्र भी हैं और अभी युद्ध प्रारम्भ भी नही हुआ पर संजय जी युद्ध का परिणाम घोषित कर रहे हैं । अब आप सोचिये की धृतराष्ट्र इस बात को सुन कर कैसे चुप रहे होंगे ? गीता में चार पात्र हैं ; प्रभु श्री कृष्ण , अ

गीता मर्म - 29

गीता मार्ग और हम भारत में शायद ही कोई ऐसा दार्शनिक हुआ हो जो गीता पर अपना मत न ब्यक्त किया हो । लोग गीता - उपनिषद् को क्यों चुनते हैं , अपनें प्रवचन के लिए ? जो लोग गीता राह पर अपनें जीवन को नहीं देखते , वे गीता पर बोलते हैं ; बात तो है कडुई पर है सत्य । आदि गुरु शंकाराचार्य से ओशो तक के जीवन को देखिये , और उनके द्वारा गीता पर बोली गयी बातों को देखिये , दोनों की दिशाएँ एक दूसरी के बिपरीत हैं , लेकीन गीता पर ये लोग जो बोले हैं , वह लोगों को आकर्षित जरुर करता है । आदि गुरु शंकाराचार्य अपनें बीस - पच्चीस वर्ष के कार्य जीवन में अद्वैत्य की लहर फैलाते रहे और बदरीनाथ - केदार नाथ जैसे मंदिरों की स्थापना भी करते रहे । उत्तर भारत के मंदिरों में दक्षिण भारतीय ब्राह्मण का कब्जा , आदि शंकराचार्य के समय में प्रारम्भ हुआ । नेपाल में पशुपति नाथ मंदिर में आज भी दक्षिण भारतीय नम्बुदरीपाद ब्राह्मण मुख्य पुजारी हैं । केरल से केदारनाथ तक नारियल कैसे पहुंचा , उस समय तो यातायात के साधन भी न केबराबर ही थे । यदि नारियल वहाँ पहाड़ पर न पहुंचता तो वहाँ के पुजारी नारियल की चटनी कैसे बनाते ? शंकाराचार्य जी बुद्

गीता मर्म - 28

गीता में तत्त्व शब्द बार - बार आता है , तत्त्व क्या हैं ? गीता के तत्त्व हैं ----- [क] भोग तत्त्व या गुण तत्त्व [ख] अहंकार जो अपरा प्रकृति का एक तत्त्व है गणित में जैसे integar and variables होते हैं , दर्शन में तत्त्व होते हैं । यहाँ एक उदाहण लेते हैं ---- भोग तत्त्व क्या हैं ? भोग तत्त्व वे हैं जो भोग को बनाए रखनें में योगदान देते हैं । कर्म तत्त्व क्या हैं ? कर्म को जो ज़िंदा रखते हैं , वे हैं कर्म तत्त्व । गीता के तत्त्व हैं ----- काम , कामना , क्रोध , लोभ मोह , भय , आलस्य , निद्रा अहंकार इन्द्रियाँ, मन , बुद्धि , चेतना आत्मा , जीवात्मा ब्रह्म , परमात्मा अपरा एवं परा प्रकृतियाँ क्षेत्र - क्षेत्रज्ञ प्रकृति - पुरुष का योग भोग , योग , संन्यास बैराग्य , ज्ञान , परम गति , परम धाम जो इन तत्वों को समझता है वह है ---- गीता तत्त्व - ग्यानी ॥ आगे चल कर हम एक - एक तत्त्व को गीता में खोजनें का प्रयत्न करेंगे , और उम्मीद है आप का साथ मिलता रहेगा ॥ ===== ॐ =====

गीता मर्म 27

गीता के तीन रत्न ------- [क] गीता सूत्र - 3.3 ज्ञान योगेन सांख्यानां कर्म योगेन योगीनां दो मार्ग हैं ; ज्ञान और कर्म जो प्रभु की ओर चलते हैं ॥ [ख] गीता सूत्र - 13.25 यहाँ प्रभु कहते हैं ...... साधाना के लिए कर्म , ध्यान और ज्ञान - तीन मार्ग हैं जो प्रभु की ओर चलते हैं ॥ [ग] गीता सूत्र - 13.3 क्षेत्र - क्षेत्रज्ञ का बोध , ज्ञान है ॥ कर्म में होश बनाए रखना , ध्यान है और यह होश ज्ञान में पहुंचाता है । प्रभु यह भी कहते हैं [ 4।38 ] ......... सभी योगों का परिणाम है ज्ञान की प्राप्ति , अर्थात ज्ञान कोई किताबों के पढनें से नहीं मिलता यह सत का अनुभव है जो कर्म के माध्यम से मिलता है । प्रोफ़ेसर आइन्स्टाइन कहते हैं ........ ज्ञान दो प्रकार का होता है ; एक सजीव ज्ञान जो चेतना से टपकता है और दूसरा ज्ञान है मुर्दा ज्ञान जो किताबों के पढनें से मिलता है ॥ अनुभव जो बिना शर्त कर्म से मिले , वह है , ज्ञान और जो शर्तों के आधार पर कर्म होते हैं उनका अनुभव अज्ञान देता है ॥ सोचिये और समझिये फिर जो आये वह करिए क्योंकि ....... जो आप करेंगे उसका परिणाम आप को ही मिलेगा ॥ कोई कर्म का परिणाम यदि सुख - दुःख में

गीता मर्म - 26

गीता के चार श्लोक ----- [क] श्लोक - 2.52 मोह के साथ बैरागी बनना संभव नहीं ॥ [ख] श्लोक - 2.51 चाह रहित कर्म मुक्ति पथ है ॥ [ग] श्लोक - 2.50 योग से कर्म कुशलता इतनी बढ़ जाती है की गलत काम हो नहीं सकते ॥ [घ] श्लोक - 2.49 जैसे कंजूष ब्यक्ति कर्म - फल से चिपका रहता है वैसे बुद्धि योगी अपनी चेतना से बाहर नहीं आना चाहता ॥ गीता के चार श्लोक बुद्धि - योग में प्रवेश के लिए काफी नजर आते हैं । बुद्धि के सम्बन्ध में प्रोफ़ेसर आइन्स्टाइन कहते हैं ....... मेरे पास भी उतनी ही बुद्धि है जितनी सब के पास , मैं बुद्धि का प्रयोग करनें में कंजूष नहीं हूँ और लोग कंजूसी से बुद्धि का प्रयोग करते हैं ॥ ==== ॐ =====

गीता मर्म - 25

गीता में प्रभु अर्जुन को युद्ध पूर्ब गुनातीत योगी बनाना चाहते हैं ----- पत्थर पर डूब उगाना प्रभु के अलावा और कौन कर सकता है ? आइये ! देखते हैं कुछ गीता सूत्रों को ...... [क] सूत्र - 18.40 पृथ्वी , देव लोक एवं आकाश में गुण रहित कुछ भी नहीं है [ख] सूत्र - 7.14 तीन गुण माया का निर्माण करते हैं [ग] सूत्र - 7.15 मायाके अधीन लोग आसुरी स्वभाव के होते हैं अर्थात उनकी पीठ प्रभु की ओर होती है [घ] सूत्र - 7.13 तीन गुणों से मोहित लोग प्रभु की ओर नहीं देखते ------- और ----- **** सूत्र - 14.5 तीन गुण न होते तो आत्मा देह में रुक नहीं सकती थी गीता के पांच सूत्र आप के लिए दिवाली भेट हैं , आप इनको अपनाएं और गीता तत्त्व विज्ञान में - कदम रखें ॥ ===== ॐ =======

गीता मर्म - 24

सांख्य - योग एवं कर्म - योग का परिणाम गीता सूत्र - 5.4 , 5.5 प्रभु अर्जुन से कहते हैं -------- अर्जुन ! सांख्य - योग एवं कर्म - योग का परिणाम तो एक है लेकीन सांख्य कठिन है ॥ आप सोचिये की परिणाम अर्थात फल है , क्या ? इस प्रश्न का उत्तर है , गीता श्लोक - 4.38 में -------- यहाँ प्रभु कहते हैं ...... सभी योगों का परिणाम एक है , ज्ञान की प्राप्ति ॥ गीता में कुछ पानें के लिए गीता में अपनें बुद्धि को घुलाना पड़ता है , गीता कोई बीज गणित की किताब नहीं की एक अध्याय में उस अध्याय की पूरी जानकारी एक जगह मिल जाती है । गीता सागर है जिसमें मनुष्य की बुद्धि को गोता लगाना पड़ता है और कई गोतो के बाद कोई एकाध मोती हाँथ लगता है । सांख्य - योग का सीधा अर्थ है - वह योग जिसकी बुनियाद तर्क - वितर्क पर हो जैसे विज्ञान , और कर्म - योग वह है जिसका आधार कर्म हो । ==== ॐ =====

गीता मर्म - 23

वासना - उपासना गीता बुद्धि - योग में प्रवेश पाने के लिए गीता में प्रभु के द्वारा प्रयोग किये गए शब्दों के माध्याम से शब्दातीत की स्थिति में पहुँचना पड़ता है । प्रभु अर्जुन को कहते हैं -- सकाम कर्म से निष्काम कर्म में झांको , साकार भक्ति के माध्यम से निराकार भक्ति में पहुँचो , गुणों के माध्यम से निर्गुण को पहचानों और वासना के माध्यम से उपासना में देखो । गीता द्वैत्य के माध्यम से अद्वैत्य में पहुंचाना चाहता है जो अस्तित्व का अपना रूप है । गीता सूत्र - 13.15 में प्रभु कहते हैं ------ वह जो इन्द्रियों का श्रोत है पर है इन्द्रिय रहित ...... वह जो सब का पालन हार है पर है अनासक्त ......... वह जो गुणों का श्रोत है पर है गुनातीत , वह है ..... परमात्मा ॥ यात्रा वहां से संभव है जहां हम वर्तमान में हैं और मनुष्य का वर्तमान है , वासना एवं लक्ष्य है , उपासना । वासना की हमारी जो नकली मित्रता है उसमें होश मय होने का नाम है , उपासना । वासना और उपासना को इस उदाहरण से समझते हैं ------- नरेन्द्र [ स्वामी विविका नन्द ] एक गरीब परिवार से थे । वे अपनी आर्थिक मजबूरी की बात स्वामी परमहंस जी से प्रायः कहा करत

गीता मर्म - 23

निष्काम कर्म दर्पण पर .... कान्हा दिखते हैं ------- गीता में प्रभु श्री कृष्ण अर्जुन को निष्काम कर्म के रहस्य को बिभिन्न ढंग से बतानें की कोशिश करते हैं और कर्म योग साधना का फल है निष्काम कर्म का होना , जिसके होनें में ज्ञान की प्राप्ति होती है । ज्ञान वह दर्पण है जिस पर कान्हा के अलावा और किसी का प्रतिबिम्ब नहीं बनता । क्या है निष्काम कर्म ? ** यदि आप गृहिणी हैं , अपने परिवार के लिए भोजन बनाती हैं , भोजन बनानें के पीछे यदि आप के मन में कोई राज न छिपा हो जैसे लोग यह कहें की आज का भोजन बहुत स्वादिष्ट है या कोई अन्य प्रकार का भाव - आप के मन में हो जो आप के अन्दर अहंकार एवं करता भाव लाता हो , ऐसा कर्म निष्कर्म कर्म नहीं होता । यदि भोजन बनानें की अवधी में आप के अन्दर यह भाव बना रहे की आप प्रभु का प्रसाद बना रहे हैं तो वह कर्म निष्काम कर्म होगा । निष्काम कर्म तब घटित होता है जब ....... ## तन मन बुद्धि प्रभु पर केन्द्रित हों ## सारा संसार प्रभु के फैलाव के रूप में दिखता हो ...... ## बुद्धि में कोई संदेह न उठता हो ..... ## कोई अपना - पराया सा न दिखता हो ..... ## सुख - दुःख में अन्तः करण एक

एक यात्रा - भाग - 02

मन कही रुकनें नहीं देता एक अनजानें मित्र से हैं , नाम है - ओशो रजनीश , पूछते हैं ..... द्रोपती या सीता किस तरह की स्त्रियों की आज जरुरत है ? मेरे प्यारे मित्र ! आप का नाम तो सुना हुआ लगता है लेकीन यह नाम उधार का है । मैं श्री चन्द्र मोहन रजनीश को कुछ - कुछ समझता हूँ और ओशो को लगभग पांचवी - छठवी सताब्दी से जानता हूँ क्यों की बोधी धर्मं को उनका एक शिष्य ओशो नाम से पुकारता था । बोधी धर्मं पल्लव राजाओं के राज कुमार थे और जब भारत में बुद्ध के समर्थकों का जीना मुश्किल हो गया तब सच्चे बुद्ध प्रेमी पलायन करनें लगे , बोधी धर्म उनमें से एक थे जो महा काश्यप के बाद दूसरे योगी थे जो चीन - जापान में जा कर बुद्ध की शिक्षाओं का प्रचार - प्रशार किया । बोधी धर्म झेंन पंथ के आदि गुरु मानें जा सकते हैं । सीता त्रेता युग की महिला थी और द्रोपती द्वापर युग की ; दोनों में एक युग की दूरी है अतः दोनों को एक तराजू पर मापना उचित नही दिखता , वैसे आप ओशो रजनीश हैं , आप को स्त्रियों की अच्छी परख होनी चाहिए ,मैं तो महा मुर्ख हूँ , इस बिषय में । त्रेता - युग और द्वापर की कहानियां तो बहुत मिलती हैं लेकीन सत - युग की

एक यात्रा

मनोरंजन यात्रा सुननें में आ रहा है की बाबा राम देव जी साहिब अगले चुनाव में अपनी पार्टी बना कर लोक सभा की लगभग सभी सीटों पर अपनें उम्मीदवार खडा करेंगे । वर्तमान की ब्यवस्था गुरूजी को भा नहीं रही , देश में राम राज्य स्थापित करनें का एक यही बिकल्प शायद गुरूजी को दिख रहा होगा । मैं बहुत छोटा तो न था , यह संभवतः संन १९६० के आस - पास की बात होगी , उस समय मैं मिडल स्कूल में रहा हूंगा । काशी में उस समय एक महान योगी थे - करपात्री जी महाराज, जो संकाराचार्यों की नियुक्तियों में अहम् भूमिका निभाते थे । हमारे पिताजी कई बार भारत आजादी के सम्बन्ध में जेल जा चुके थे लेकीन आजादी के बाद वे पूर्ण गांधीवादी का जीवन जिए ; स्वयं अपना कपड़ा अपनें द्वारा सूत तैयार करके बनाते थे और राजनीति से काफी दूर अपनें को रखा था लेकीन हर इलेक्सन में लोग उनके पास आते जरुर थे । करपात्री जी का कर ही उनका बर्तन था अर्थात भोजन पात्र उनका हाँथ थे । गुरूजी अपनें आखरी समय में लोगों की राय में आ कर अपनी एक पार्टी बनाई - राम राज्य परिषद और उत्तर प्रदेश के पूर्वी भाग में अपनें लोगों को इलेक्सन में खड़ा किया लेकीन उनमें से कोई ज

गीता मर्म - 19

गीता अध्याय 11 श्लोक -- 01 से 04 तक अर्जुन कहते हैं ...... आप की बातें सुननें से मेरा मोह समाप्त हो गया है , लेकीन मैं आप के आश्वर्य , अब्यय रूप को देखना चाहता हूँ । मैं नहीं मानता की गीता का अर्जुन श्री कृष्ण का परम भक्त है और जो परम भक्त समझते हैं वे स्वयं तो अन्धकार में हैं ही सुननें / पढ़नें वालों को भी अन्धकार में डालनें की कोशिश कर रहे हैं । अर्जुन इस प्रश्न से पहले अध्याय - 10 में प्रभु से 32 श्लोकों में 92 उदाहरणों के माध्यम से प्रभु के बिभिन्न साकार एवं भावात्मक स्वरूपों के सम्बन्ध में जाना लेकीन अभी भी संतुष्ट नहीं हो पा रहे हैं । अध्याय - 10 में अर्जुन यह भी कहते हैं ------ आप परम ब्रह्म , परम धाम , आदि देव , शाश्वत पुरुष , दिब्य , अजन्मा हैं , आप के गुण को ऋषि नारद , ब्यास , देवल , असित गाते हैं । अर्जुन इतनी बातें करनें के बाद प्रश्न करते हैं -- मैं आप को किन - किन रूपों में जानूं और मैं आप को कैसे स्मरण करूँ ? अर्जुन बचपन से साथ रहे हैं , प्रभु उनके मामा के पुत्र हैं , लेकीन युद्ध - क्षेत्र में पहुंचकर प्रभु को जानना चाहते हैं , क्या यह उचित दिखता है ? गीता का अर्जुन हम -

गीता मर्म - 18

गीता के कुछ शब्द अनन्य योगी अनन्य भक्ति ब्यवसायिका बुद्धि परम भक्ति परा भक्ति इन शब्दों को समझनें के लिए आप देख सकते हैं , गीता के निम्न श्लोकों को ------- 2.41 2.44 8.14 12.6, 12.7 13.11, 13.12 18.54, 18.55 जो शब्द ऊपर बताये गए हैं उनका सम्बन्ध सीधे तौर पर स्थिर मन , स्थिर बुद्धि से है । जब अभ्यास - योग से मन - बुद्धि में प्रभु के अलावा और कुछ नहीं रह जाता , तब उस योगी की स्थिति अनन्य भाव की होती है , अनन्य भाव ठीक भावातीत की स्थिति से पहले की स्थिति होती है , जहां ---- सर्वत्र प्रभु दिखता है ....... सब में प्रभु दिखता है ..... सब प्रभु में दीखते हैं ..... और वह योगी परम आनंदित होता है ॥ ===== ॐ ======

गीता मर्म - 17

हमारा भ्रमित जीवन कभीं मंदिर जा कर देखना , यदि न जाते हो तो , वहाँ जानें वालों की लम्बी - लम्बी कतारें आप को मिलेंगी । मंदिर के अन्दर जो लोग प्रवेश करते हैं उनके जेब में कुछ धन होता है और हांथों में प्रसाद के नाम पर कुछ फल -फूल भी हो सकता है । मंदिर में प्रवेश पानें वालों की कतारों में अधिकाँश लोग ऐसे हैं जो धन से संपन्न होते हैं । मंदिर के बाहर भी लोगों की कतारें होती हैं जिनको मंदिर में जाना नहीं होता , उनको परमात्मा से कुछ लेना देना नही होता , उनकी नज़र मंदिर से बाहर आनें वालों पर होती हैं , इस उम्मीद पर की शायद कुछ उनसे मिल जाए । मंदिर के अन्दर जो जा रहे हैं उनकी भी अपनी - अपनी मांगे हैं और बाहर जो कतारें लगाए है , वे तो हैं ही भीखारी । प्रभु के बारे में सुननें वालों की संख्या बहुत है लेकीन ----- प्रभु के पास जानें को उनमें से कितनें तैयार हैं ? सभी शास्त्र मोक्ष का मार्ग दिखाते हैं , मंदिरों में प्रवचन देनें वाले भी मोक्ष प्राप्ति का उपाय बताते हैं , लेकीन मोक्ष पानें के लिए मरना पड़ता है और मरनें के नाम पर लोगों की टाँगे कापनें लगाती है , फिर प्रवचन क्यों सुननें जाते हैं ? आदमी ए

गीता मर्म - 16

गीता रहस्य की एक झलक [क] गीता सूत्र - 2.48 आसक्ति रहित कर्म , समत्व- योग है ...... [ख] गीता सूत्र - 18.24 अहंकार में किया गया कर्म , राजस कर्म होता है ..... [ग] गीता सूत्र - 3.19,3.20 आसक्ति रहित कर्म , प्रभु का द्वार है ..... गीता के तीन सूत्र आप को दिए गए , आप इन सूत्रों में अपनें को देखें , ये सूत्र एक दिन के लिए नहीं हैं , इनको रोजाना आप अपनाएं , यदि श्री कृष्ण मय होनें के इच्छुक हों तब । आसक्ति एवं अहंकार रहित होना अपनें बस में नहीं है , यह योग की एक स्थिति है जहां आसक्ति - अहंकार स्वतः लुप्त हो जाते हैं और प्रभु की ऊर्जा कण - कण में भर जाती है । मनुष्य कुछ कर नहीं सकता , क्योंकि वह जो भी करेगा उसके करनें की ऊर्जा निर्विकारनहीं होगी , उसके तन , मन एवं एवं बुद्धि में गुणों की ऊर्जा होगी जो प्रभु की ओर होनें नहीं देती । प्रभु में मन को टिकाना , प्रभु मय बना सकता है ..... प्रभु की सोच योगी बनाती है ..... प्रभु में टिका मन , बैरागी बनाता है .... संसार के आकर्षण का द्रष्टा , प्रभु मय होता है ..... ====== ॐ =======

गीता मर्म - 15

जीवन धारा मनुष्य का जीवन एक दरिया की धारा जैसा है जबकि अन्य जीवों में यह बात नहीं है क्योंकि ------ [क] मनुष्य के जीवन में दो केंद्र हैं ; भोग और भगवान् , जबकी अन्य जीव भोग केन्द्रित हैं । [ख] मनुष्य को भोग केंद्र से योग के माध्यम से प्रभु तक पहुंचनें की सोच होती है , जबकि ----- [ग] अन्य जीव भोग अर्थात भोजन एवं काम के अलावा और कुछ नहीं सोच सकते , हाँ अपनें बच्चों की परवरिश परम्परा गत ढंग से करते जरुर हैं । मनुष्य दो प्रकार के होते हैं ; एक भोग को ही अपनी सीमा समझ कर भोग को अलग - अलग ढंग से से समझते हैं , यहाँ तक की भगवान् को भी भोग के लिए प्रयोग करते हैं । मनुष्य की दूसरी श्रेणी है उनकी जो भोग को भी भगवान् की खोज का एक माध्यम समझ कर अपना जीवन चलाते हुए परम गति को प्राप्त करते हैं । जीवन धरा के दो किनारे से दीखते हैं , सुख - दुःख , अपने - पराये आदि । जो लोग सम भाव में जीते हैं , उनसे प्रभु दूर नहीं रहता । सम भाव की साधना ही गीता की साधना है । सम भाव् का अर्थ है भाव रहित स्थिति में रहना । अपनें जीवन के किनारों से जो टकरा कर चलते हैं , वे दुखी ब्यक्ति हैं और जो धारा में साक्षी भाव

गीता मर्म - 14

गीता सूत्र - 18.2 कर्म , कामना , कर्म - फल एवं त्याग समीकरण प्रभु कह रहे हैं ------ [क] जिस कर्म में कामना न हो वह कर्म संन्यासी कर्म है ...... [ख] जिस कर्म में कर्म - फल की सोच न हो , वह कर्म , त्यागी बनाता है ...... कर्म एक सहज माध्यम है जो एक तरफ भोग से जोड़ता है और दूसरी तरफ प्रभु का द्वार भी दिखाता है । भोग में जो आसक्त हुआ , उसकी पीठ प्रभु की ओर हो जाती है और जो भोग में उदासीन हुआ उसे प्रभु का द्वार खोजना नहीं पड़ता , उसका हर कदम उधर ही उठता है । संन्यासी और त्यागी शब्द भोगी के शब्द हैं अतः इनको बुद्धि से समझना जरुरी है ---- कर्म करनें वाला जब यह समझता है की ..... [क] मैं तो निमित्त मात्र हूँ , मैं तो साक्षी हूँ , मैं तो द्रष्टा मात्र हूँ , कर्म करनें वाला , गुण हैं , तब वह सन्यासी होता है । संन्यासी का अर्थ है , भोग - तत्वों की पकड़ में न आना । [ख] कर्म करता के कर्म में जब भोग तत्वोंकी पकड़ नहीं होती तब भोग तत्वों का वह करता , त्यागी कहलाता है । संन्यास एवं त्याग कर्म योग की दो ऎसी दशाएं हैं जो कर्म - योग सिद्धि पर एक साथ स्वयम घटित होती हैं । गीता सूत्र - 4.38 कहता है .... योग

गीता मर्म - 13

गीता संकेत [क] माया का गुलाम माया पति कैसे बनेगा ? [ख] गुणों का गुलाम गुनातीत कैसे हो सकता है ? [ग] कर्मों का गुलाम कर्म - योगी कैसे बन सकता है ? [घ] मोह में उलझा बैरागी कैसे बनेगा ? [च] अहंकार का गुलाम भक्त कैसे बनेगा ? [छ] काम में उलझा संन्यासी कैसे बन सकता है ? [ज] किताबों में फसा , ग्यानी कैसे हो सकता है ? [झ] राग , भय एवं क्रोध का जो गुलाम हो वह सम भाव योगी कैसे होगा ? आप गीता के इन संकेतों में अपनी ऊर्जा को लगाएं और तब आप को जो आनंद मिलेगा , उसका मज़ा देखें ॥ ===== ॐ =======