Gita kahata hai ( 4.40,4.42) :----- Sandeh ke saath sukhi rahana sambhav nahii ...... Aur Sandeh agyan ki pahachan hai // Ab aap in do samikarano ko apane Dhyan ka maafhysm banayen . ***** OM ******
पतंजलि योग दर्शन में समाधि क्या है ? भाग : 01 ( संप्रज्ञात समाधि ) महर्षि पतंजलि अपनें योग दर्शन में निम्न प्रकार की समाधियों की चर्चा करते हैं ⬇️ # संप्रज्ञात समाधि #असंप्रज्ञात समाधि # धर्ममेघ समाधि संप्रज्ञात समाधि के संदर्भ में सवितर्क - निर्वितर्क एवं सविचार - निर्विचार समापत्तियों की भी चर्चा करते हैं । अब हम ऊपर व्यक्त 03 प्रकार की समाधियों और 04 प्रकार की समापत्तियोंं को समझते हैं । संप्रज्ञात समाधि क्या है ? पतंजलि योग दर्शन के साधन पाद में अष्टांगयोग साधना की चर्चा की गई है । यम , नियम , आसन , प्राणायाम , प्रत्याहार , धारणा , ध्यान और समाधि अष्टांगयोग के 08 अंग हैं । यहां समाधि शब्द संप्रज्ञात समाधि के लिए प्रयोग किया गया है जो आलंबन आधारित होती है और जिसे सबीज या साकार समाधि भी कहते हैं । संप्रज्ञात समाधि को समझने से पूर्व धारणा और ध्यान को समझना चाहिए । धारणा अष्टांगयोग का 6 वां अंग है धारणा । चित्तको किसी देश ( सात्त्विक आलंबन ) से बांध देना धारणा है (पतंजलि साधनपाद सूत्र - 1 ) " तत्र , प्रत्यय , एकतानता , ध्यानम् " ध्यान में चित्...
आप अपनें पौराणिक कथाओं पर एक नज़र डालें ----- हमारे ऋषियों को कुछ इस ढंग से प्रस्तुत किया गया है जैसे नशे में हों , जी लोगों का काम है ---- बात - बात पर श्राप देना ... जैसे जा तूं अगले जन्म में अजगर बनेगा ...... जा तूं अगले जन्म में छिपकली बनेगा , आदि - आदि ॥ हमारे ऋषि लोग जो अपनी सुरक्षा तो कर नही पाते , उनको बचानें के लिए अवतार होते हैं ---- संभवामि युगे - युगे [ गीता - 4।8 ] इस से साफ़ - साफ़ जाहिर होता है की अहंकार का असर तब तक रहता है जब तक तन में प्राण है । गीता में प्रभु कहते हैं ....... तीन गुणों की मेरी माया है , जिसमें दो प्रकृतियाँ ; अपरा और परा हैं । अपरा प्रकृति के आठ तत्वों में से एक तत्त्व है - अहंकार । अहंकार दो प्रकार के होते हैं - धनात्मक और रिनात्मक । धनात्मक अहंकार राजस गुण के तत्वों के साथ होता है और रिनात्मा अहंकार तानस गुणों के तत्वों के साथ यात्रा करता है । अहंकार एक ऐसा तत्त्व है जो बैराग्यावस्था में पहुंचनें तक पीछा नहीं छोड़ता और योगी, बैराग्य से गिर कर नीचे की योनियों में जन्म ग्रहण करता है । बुद्ध कहते हैं ---- हम दूसरों की गलती पर स्वयं को सजा देते हैं क्यो...
गीता सूत्र - 6.1 योगासनों से कर्म करनें की ऊर्जा को नष्ट करके कोई योगी - संन्यासी नहीं बन सकता । कर्म ऐसा होना चाहिए जिसमें कर्म - फल की पकड़ न हो , तब वह कर्म , योगी - संन्यासी बनाता है ॥ गीता सूत्र - 6.3 कर्म - योग एवं कर्म - संन्यास - दोनों मुक्ति पथ हैं ॥ गीता सूत्र - 4.12 यज्ञों के माध्यम से देव - पूजन करनें से इक्षित कामनाएं पूरी हो सकती हैं ॥ गीता - सूत्र - 4.19 कामना - संकल्प रहित कर्म - योगी , ज्ञानी होता है ॥ गीता सूत्र - 7.20 - 7.22 तक देव पूजन से कामनाएं पूरी हो सकती हैं ॥ गीता के कुछ सूत्रों के सारांशों को आप के सामनें रखा गया है , कुछ इस प्रकार से की गीता को वैज्ञानिक बुद्धि में बैठाया जा सके , अब आप इसका प्रयोग अपनें जीवन में किस तरह से करते हैं , यह आप के ऊपर है ॥ एक बात और स्पष्ट कर देते हैं : देव पूजन से इक्षित कामनाओं का पूरा होना क्या है ? जो मांगो ,वही मिलेगा - ऎसी बात नहीं है , मनुष्य को योगी जीवन जीनें के लिए जिन कामनाओं की आवश्यकता हो सकती है , केवल उनकी पूर्ति , देव पूजन से संभव है , वह भी यज्ञों के माध्यम से ॥ अब देखिये यज्ञ क्या हैं ? प्रभु मय होनें के लिए जो...
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